उत्तराखण्ड की त्रासदीः यात्रा विवरण

मैं 16-17 जून 2013 को आयी आपदा के तत्काल बाद अलकनन्दा एवं मन्दाकिनी के बाढ़ से प्रभावित क्षेत्रों में तीन-तीन बार गया, उसके बाद पिण्डर नदी एवं बागेश्वर जिले की सरयू एवं रामगंगा नदी, पिथौरागढ़ जिले की गौरी-धौली के साथ ऐलागाढ़ और काली नदी तक की यात्रा की। इसके बाद उत्तरकाशी जिले के धनारीगाढ़, भागीरथी, टिहरी जिले के थत्यूड़ तक भी गया जहां पर तीन नदियों का संगम है, जिसमें अगलाड़ गाढ़ मुख्य है।

इन यात्राओं के दौरान ओमप्रकाश भट्ट सभी क्षेत्रों में साथ रहे। मन्दाकिनी क्षेत्र में श्री रमेश पहाड़ी, श्री अनुसूया प्रसाद मलाशी, श्री रमेश चन्द्र जमलोकी सह यात्री थे। अलकनन्दा में श्री प्रेमबल्लभ भट्ट, श्री दरमान सिंह नेगी, श्री भूपाल सिंह नेगी। भागीरथी में श्री सूरत सिंह रावत, टिहरी जनपद के थत्यूड़ में श्री मनोज रावत तथा कुमाऊं मण्डल के सरयू, रामगंगा, गोरी, एलागाड़, धौली, काली आदि नदियों के क्षेत्र में प्रो. शेखर पाठक, डा. समीर बनर्जी, श्री राजेन्द्र सिंह एवं श्री जगत सिंह साथ रहे। ओमप्रकाश भट्ट अलग से केदारनाथ एवं उसके उपरी क्षेत्र में ध्वस्त चैराबाड़ी और उसके आसपास तक गए एवं उन्होंने उच्च हिमालय क्षेत्र के हिमननदों के चित्र भी लिए एवं बासुकी ताल एवं ग्लेशियरों में हुई टूट-फूट के चित्र भी लिए।

हम लोगों ने यात्रा के दौरान अलग-अलग क्षेत्रों में प्रभावित लोगों एवं संगठनों से चर्चा की, उनसे 16-17 जून का आखों देखा हाल तो सुना ही, लोगों के अनुभवों के आधार पर इस आपदा के कारकों, कारणों एवं प्रभाव की जानकारी भी प्राप्त हुई।

मन्दाकिनी नदी, मुख्यतः शान्त दिखने वाली रही है। समय-समय पर इसकी सहायक धारायें बौखलाती रही है, जिसके कारण मन्दाकिनी इनके अवसाद से प्रभावित हुई और बोखलायी। सन 1961 के 26-27 जुलाई को हुई अतिवृष्टि से मन्दाकिनी की सहायक धारा-डमार गाड़ बहुत बोखलायी थी और भीरी के पास मन्दाकिनी को अवरूद्व भी किया था। उस समय एक बड़े भूस्खलन से डडुवा गांव नष्ट हुआ था जिसमें तीन दर्जन से अधिक लोग एवं पशु मारे गए थे। सन 1979 में मन्दाकिनी की सहायक नदी क्यौंजागाढ़ के जलग्रहण क्षेत्र में कुन्था एवं बाड़व के इलाके में भयंकर भूस्खलन हुआ और वहां पर 40 के लगभग लोग मारे गए तथा अपार धन सम्पदा की क्षति हुई। क्यौंजागाड़ के बौखलाने का प्रभाव मन्दाकिनी पर भी पड़ा। सन 1991 में उत्तरकाशी भूकम्प का प्रभाव मन्दाकिनी घाटी में भी पड़ा लोगों के मकान नष्ट हुए तथा सड़कों एवं पहाड़ियों पर दरारे भी पड़ी। केदारनाथ में भी मकान नष्ट हुए, कुछ पर दरारे पड़ी तथा चार यात्रियों के मारे जाने की जानकारी है। स्थानीय लोगों के अनुसार मन्दाकिनी के उद्गम क्षेत्र के ग्लेश्यिरों की टूटने की आवाज भी लोगों ने सुनी। अगस्त 1998 में उखीमठ के पास एक पहाड़ के टूटने से भेंटी और बरूवा गांव पूरी तरह से मलबे के नीचे दब गए थे एवं मन्दाकिनी की सहायक धारा मधमहेश्वरी नदी में झील बन गयी थी और इस पूरे इलाके में छोटे-बड़े भूस्खलनों से 16 गांव प्रभावित हुए थे और 100 से ज्यादा लोग मारे गए थे।

16-17 जून 2013 को मन्दाकिनी नदी के उद्गम स्थल चैराबाड़ी-लेक, केदारडोम, केदारखूंटा, सुमेरू पर्वत आदि क्षेत्र में हुई अतिवृष्टि के कारण प्रलयंकारी बाढ़ से केदारनाथ, रामबाड़ा और गौरीकुण्ड में भयंकर तबाही हुई जिसमें हजारों लोग मारे गए, सैकड़ों पशु भी मारे गए, अपार धन-सम्पदा की हानि भी हुई। इस बाढ़ के प्रवाह को निचले क्षेत्र रामपुर में निर्मित बिजली परियोजना के बैराज ने कुछ समय के लिए रोका जिससे वहां पर अस्थायी झील जैसी बनी, जिसके कारण सोनप्रयाग एवं रामपुर में अपार धन-सम्पदा के साथ दर्जनों बसें एवं कारें प्रलय की चपेट में आयी तथा कई मकान भी जमीदोज हो गए। अंततः उस अस्थायी लेक के दबाव के कारण विद्युत परियोजना के लिए बने बैराज को तोड़ते हुए निचले क्षेत्रों मे भी कई गांवों को अस्थिर करते हुए मंदाकिनी का प्रलयंकारी बेग उखीमठ के निचले भाग में स्थित कुण्ड नामक स्थान पर बने हुए एक और बैराज के कारण कुछ देर अवरूद्व रही और फिर बैराज को नष्ट करते हुए मन्दाकिनी ने प्रलयंकारी तबाही मचाई। जिसमें गांव, बाजार,खेत, पुल आदि का अपार नुकसान हुआ। मन्दाकिनी नदी में इन विद्युत परियोजनाओं द्वारा जगह-जगह जो विशाल मलवे के ढेर लगाए गए थे उसके भी नदी के बाढ़ के साथ बहने से नदी का वेग प्रचन्ड हो गया था इस प्रकार कुण्ड से लेकर तिलबाड़ा तक कई गांव, बाजार सदा के लिए मन्दाकिनी में समा गए, और कई गांवों और बाजारों का अस्तित्व संकट में पड़ गया है।

मन्दाकिनी की ही सहायक धारा मधुगंगा {काली नदी} जिसका उद्गम केदारनाथ के पूर्व की दिशा में स्थित हिमनदों से होता है इस नदी ने भी प्रलयंकारी रूप धारण किया और कोटमा के गांव के नीचले भाग में स्थित विद्युत परियोजना के ध्वस्त होने से काली गंगा ने भी प्रलयंकारी रूप धारण किया जिसके कारण ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल कालीमठ एवं उसके समीपवर्ती इलाकों में तबाही हुई।

अलकनन्दा की सहायक धारा खिरौं गाढ़ जो कि हनुमान चट्टी के निचले भाग में स्थित बैनाकुली के पास अलकनन्दा में समाहित होती है, का उद्गम नीलकण्ठ के निचले भाग में स्थित हिमनदों एवं हिमतालाबों से होता है मुख्य रूप से उनियाणी ताल से जल मिलता है। इस उनियाणी ताल, के उपर हिमनदों के टूटने से भरावे के बाद खिरौंगाड़ बौखलायी, इससे खिरौगाड़ के दोनों पाटों पर स्थित जंगलों को नष्ट करते हुए इसने बैनाकुली के पास अलकनन्दा को कुछ समय के लिए अवरूद्व कर दिया था। खिरौंगाढ़ की बाढ़ के कारण डंगडरा गांव के मकान एवं खेत तो नष्ट किए ही अपितु खिरौगांव के मकान एवं खेत भी नष्ट हुए। यही नही अलकनन्दा के उपरी भाग में स्थित बैनाकुली गांव के कुछ मकान, खेत और जंगल भी इस बाढ़ के कारण नष्ट हुए। इससे आगे विष्णुप्रयाग जलविद्युत परियोजना के बैराज स्थल के अवरोध को नष्ट करते हुए अलकनन्दा ने और उग्र रूप धारण किया जिससे लामबगड़ बाजार एवं गांव को भी नष्ट किया। और इसने पाण्डुकेश्वर के खेतों आदि को नष्ट करते हुए गोविन्दघाट में भयंकर तबाही मचाई, जिसमें मकान, होटल तो नष्ट हुए ही गुरूद्वारा भी साद से पट गया। अलकनन्दा में विष्णुप्रयाग परियोजना का मलबा बहने से इसने और भी उग्र रूप धारण किया।

हेमकुण्ड के निचले भाग से उद्गमित भ्यूंडार गंगा ने घांघरिया के उपरी भाग से बौखला कर इसने भ्यूंडार गांव एवं पुलना गांव को तहस नहस करके रख दिया था। इसमें गांव के मकान, मवेशी, खेत आदि नष्ट किए। गोविन्दघाट के कुछ आगे भ्यूडार गंगा अलकनन्दा में समाहित होती हैं। इसी प्रकार हेलंग के पास तपोवन-विष्णुगाड़ तथा विष्णुगाड़-पीपलकोटी विद्युत परियोजना के मलबे ने भी अलकनन्दा की मारक क्षमता को और बढ़ाया और अलकनन्दा के तटवर्ती क्षेत्र बिरही, कर्णप्रयाग, रूद्रप्रयाग में अलकनन्दा के किनारे के भवनों को साद से पाट दिया।

रूद्रप्रयाग में मन्दाकिनी अलकनन्दा में समाहित हो जाती है। इसके बाद श्रीनगर जलविद्युत परियोजना द्वारा जमा किये गये मलबे को अलकनन्दा के तीव्र प्रवाह ने बहा दिया, जिससे श्रीनगर में भी भारी तबाही हुई और गाद से मकान भर गए।
भागीरथी नदी गोमुख हिमनद से उद्गमित होती है। इसमें भैरव घाटी के पास जाड़ गंगा मिलती है, बाद में यह सीधे खड़े चट्टानों को काटती हुई आगे बढ़ती है। दशेक किलोमीटर आगे धराली बाजार के पास इसमें क्षीर गंगा समाहित होती ह।ै 16-17 जून को क्षीर गंगा, जो देखने में बहुत छोटी है और जिसे हिमनदों से ही जल मिलता है, में भी भयंकर बाढ़ आयी, जिसके कारण धराली बाजार और गांव के घरों को पांच फुट से अधिक दलदली मिट्टी ने पाट दिया। कई वाहन भी इसकी चपेट में आये। भागीरथी की ही सहायक धारा डिडसारी गाड़ में आयी बाड़ से डिडसारी गांव के मकान एवं खेतों को नष्ट किया ही, साथ ही भागीरथी को कुछ समय के लिए अवरूद्व कर आगे भी बहुत तबाही मचाई। भागीरथी की सहायक जलन्धरी गाड़ की बाढ़ से बगोली एवं हरसिल गांव के बगीचे, खेत नष्ट हुए। धनारीगाड़, जो भागीरथी में डूंडा के पास मिलती है, ने धनारी पट्टी के खेत, सिचाई की नहरें एवं पेयजल योजनाओं को भी नष्ट किया। इसी प्रकार सौरागाड़ ने भी भारी नुकसान किया।

टिहरी जिले के थत्यूड़ के पास अगलाड़ नदी में पाली गाढ़ और बेल गंगा समाहित होती है। अगलाड़ आगे यमुना ब्रिज के पास यमुना नदी में मिल जाती है। इन तीन नदी नालों के जलग्रहण क्षेत्र में हुए भूस्खलन एवं बाढ़ ने चालीस से अधिक गांवों के खेत मकान आदि नष्ट किए। इसी प्रकार यमुना घाटी में बड़कोट से आगे खरादी बाजार की तीन दर्जन से अधिक मकान और दुकानें नष्ट हुई और यहां भी एक लघु जल विद्युत परियोजना के मलबे ने इस तबाही की मारक क्षमता बढ़ायी।

अलकनन्दा की सहायक धारा नन्दाकिनी के पणढाल वाले क्षेत्र में भूस्खलन से जगह-जगह नुकसान तो हुआ ही इसके दोनांे पनढालों मे लोग मारे गए। यही हाल मैनागाढ़-कल्पगंगा में भी हुआ। जहां जन-धन सम्पदा का नुकसान हुआ।

अलकनन्दा की सहायक धारा पिण्डर, पिण्डारी ग्लेशियर से उद्गमित होकर कर्णप्रयाग के पास अलकनन्दा में मिल जाती है, के जलग्रहण क्षेत्र में भी भारी तबाही हुई। मुख्य रूप से नारायणबगड़ और थराली बाजार मे ंभारी नुकसान हुआ और आगे भी इनका आस्तित्व खतरे में है और कई नए भूस्खलन भी उभरे हैं जो भविष्य की तबाही के कारण बन सकते हैं।

बागेश्वर जिले से उद्गमित सरयु नदी यद्यपि हिमनदों से उद्गमित नहीं होती है, लेकिन उच्च पर्वत शिखरों से जाड़ों मे ंहुए हिमपात का पानी लेकर वह अपनी कई छोटी बड़ी सहायक धाराओं को समेटती हुई पूर्वी रामगंगा में रामेश्वर के पास मिल जाती है। सरयु नदी एवं उसकी सहायक जलधाराओं के जल से यह घाटी बहुत उत्पादक मानी जाती है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से इस घाटी में बिजली परियोजनाओं के मलबे के कारण लोगों के खेत एवं उनकों सिंचित करने वाली गूले नष्ट हुई हैं और यहां की हरियाली पर बहुत प्रभाव पड़ा है व अस्थितरता बढ़ी है। इस वर्ष भी अतिवृष्टि के कारण दो बिजली परियोजनाओं के मलबे ने बाढ़ को बढ़ावा दिया और सरयु नदी में भी बाढ़ आयी जिस कारण अधिकांश सिंचाई गूलें तथा पेयजल योजना ठप पड़ी है लोगों के खेत मकान भी नष्ट हुए। रीठाबगड़ के पास खैर गाढ़ ने सरयु नदी में भारी तबाही मचाई और यहां पर चार लोगों की जान भी चली गई।

पिथौरागढ़ और बागेश्वर को विभाजित करने वाली रामगंगा जिसका उद्गम नामिक एवं हीरामणि हिमनद से है, से प्रवाहित होकर यह बागेश्वर, पिथौरागढ़ एवं चम्पावत जिलों को स्पर्श करते हुई, रामेश्वर के पास सरयु के समाहित होती है आगे चलकर पंचेश्वर के पास काली में समाहित हो जाती है तथा आगे यह शारदा व बाद में घाघरा बन कर बलिया एवं छपरा जिलों के समीप गंगा में मिल जाती है। रामगगा ने अपने मूल से लेकर थल तक बहुत तबाही मचाई, कई जगह धारा परिवर्तन भी हुआ। लोगों के खेत तथा मकान तबाह हुए भूस्खनों के कारण कई इलाके अस्थिर हो गए हैं।

गोरी नदी जो मूलरूप से मिलम गल से उद्गमित होकर आगे इसमें गुंथागाढ़, रालम गाढ़ एवं मदाकना गंगा का मिलन होता है और जौलजीवी के पास काली नदी में मिल जाती है। गोरी ने अपने मूल से ही उग्र रूप घारण कर दिया था, इसके रास्ते में जो भी अवरोध आया उसे तहस-नहस करते हुए आगे बढ़ती गई। इसके रास्ते में बायी ओर उपरी भाग में स्थित मदकोट बाजार को भी नष्ट किया इसके अलावा इसके रास्तें में आये खेत, सड़क और पुलों को नष्ट करते हुए आगे बढ़ी। इस प्रकार मिलम और रालम से लेकर जौलजीवी तक गोरी में भी प्रलयंकारी बाढ़ आयी। गोरी ने काली नदी के धार को दायी बाई ओर को धकेल दिया। इसके बड़े-बड़े पत्थरों के ढेर आज भी वहां दिखायी देते हैं।

जौलजीवी से तवाघाट तक काली नदी ने भारी तबाही मचाई है। दोनों पाटों में मकान, खेत, सड़क पुल जो उसके सामने था उसे नष्ट किया। इस बीच बलुवाकोट, कालिका, दोवाट, धारचूला, ऐलागाढ़ तथा नई बस्ती आदि में भारी नुकसान देखा गया।

धौली नदी जिसका जलग्रहण क्षेत्र हिमनदों एवं उच्च हिमालयी शिखरों वाली दारमाघाटी है उसमें सोबला, खेत आदि में भारी नुकसान किया ही, तवाघाट में काली नदी में मिलकर काली को भी बौखला दिया। जिससे निचले भाग में भारी नुकसान हुआ। यहां भी परियोजनाओं के मलबे ने धौली की बौखलाहट बढ़ाने में बढ़-चढ़ कर हिस्सेदारी निभायी।

सम्पूर्ण हिमालय जो पूर्व से पश्चिम तक ढाई हजार किलोमीटर से अधिक लम्बाई तथा दो सौ पचास से लेकर चार सौ किलोमीटर चैढ़ाई में फैला है। जहां हमारे देश की तीन प्रमुख नदियां गंगा, बह्मपुत्र तथा सिन्धु एवं उनकी सहस्त्रों धाराओं का उद्गम स्थल है। इन तीनों धाराओं का 43 फीसदी बेसिन हमारे देश के अन्तर्गत आता है। जिसमें 63 प्रतिशत जलराशि प्रवाहित एवं भूमिगत है। हिमालय को मिट्टी,जल और वनस्पति क ेजनक के रूप् में भी देखा जा सकता है मौसम का नियंत्रक एवं तापमान को भी प्रभावित करता है। इस सबके बाबजूद अत्यन्त संवेदनशील है। कहा जाता है कि इसके अन्तर्गत तीन मुख्य भ्रंस हैं, इनमें मुख्य केन्द्रिय भं्रस-एमसीटी- जो सघन आबादी से गुजरता है, अभी भी सक्रिय है,यदा-कदा इस क्षेत्र में आने वाले भूकम्प इसकी नाजुक स्थिति का आभास कराते रहते हैं। इसकी नाजुकता का प्रभाव यहां के निवासियों को तो भुगतना पड़ता ही है। अब स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि इससे लगे मैदानी क्षेत्रों पर भी पड़ने लगा है। इधर मोसम में होने वाली हलचल तथा महाविकास की गतिविधियों ने यहां से होने वाले विनाश का दायरा बढ़ा दिया है तथा समय में भी तेजी आ गई है। मौसम तथा महाविनाश का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव मध्यहिमालय में देखा जा रहा है। वर्ष 2013 के जून महीने में गंगा ओर उसकी सहायक धाराओं में आयी प्रलयंकारी बाढ़ जिसमें हजारों निरीह यात्री, पर्यटक तथा स्थानीय लोग मारे गए। उनके पशु भी मारे गए। यातायात छिन्न-भिन्न हो गया। सैकड़ों गांव उजड़ गए। लोगों की आजिविका पर भी प्रश्नचिन्ह् लग गया। यह सब इस बार उत्तराखण्ड में घटित हुआ और देखा गया।

मध्य हिमालय का उत्तराखण्ड क्षेत्र एक ओर नेपाल की सीमा को विभाजित करती काली नदी तथा पश्चिम में हिमांचल प्रदेश के साथ यमुना-टौंस- के बीच फैला है। गंगा की सहायक धारायें यमुना, भागीरथी, भिलंगना, मन्दाकिनी, नन्दाकिनी, पिण्डर, अलकनन्दा, सरयु, रामगंगा, गोरी-धौली तथा काली जैसी नदियों तथा इनकी सैकड़ों सहधारायें उच्च हिमालय में पसरे सैकड़ों हिमनदों से उद्गमित होकर इन्हें सदाबहार बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। स्टडी गु्रप आन हिमालयन ग्लेशियर 2011 के अनुसार यमुना के जलागम में 52 हिमनद, भागीरथी में 258 हिमनद, अलकनन्दा में 407 हिमनद तथा घाघरा-गौरी, काली, धौली, और रामगंगा- में 271 हिमनदों का जल मिलता है। इसी प्रकार इन हिमनदों के बीच एवं आसपास 127 के लगभग छोटे-बड़े हिमतालाब-ग्लेशियर लेक- भी हैं। इसके बाद बुग्याल, जो वृक्ष पंक्ति तक फैले हैं। ये विभिन्न वन्य पुष्पों एवं वनऔषधियों से आच्छादित हैं। इसके बाद ही छह-सात हजार फुट की ऊंचाई तक ऐसे जंगल हैं जो औषधीय गुणों के साथ चैड़ी पत्ती के होने से बर्फ एवं बारिस की मारक क्षमता को नियंत्रित करते हैं। इस पूरे उपरी क्षेत्र के संरक्षण के लिए पूराने अनुभवी एवं ज्ञानी लोगों ने समृद्व परम्परायें स्थापित की हैं। ये परम्परायें ऊंची आवाज लगाना, लाल कपड़े जूते पहन कर जाने को प्रतिबंधित करती थी। ड्रम बजाना वर्जित था। औषधीय पादपों को समय पूर्व उखड़ना एवं तोड़ना वर्जित माना जाता था। यही नहीं गंदगी करना भी इन इलाकों में मनाही थी। इसके पीछे लम्बी सोच और अनुभवजनित ज्ञान का समावेश दिखाई देता है। यह सब किसी राजाज्ञा या प्रतिबंधात्मक आदेशों से नहीं अपितु इन सब बातों को धर्म और संस्कृति के साथ जोड़कर इस प्रकार की परम्पराओं का समावेश किया गया। इसमें आगे यह भी जोड़ा गया कि इसका अनुपालन न करने वालों को वनदेवी या वन देवता ‘हर’ लेगें यानि कष्ट देंगे। यदि किसी को उच्च हिमालय में स्थित औषधीय पादपों की आवश्यकता है तो याचना के बाद ही उसका उपयोग करने की इजाजत होती। कमोवेश कई इलाकों में आज भी इसका अनुपालन होता रहता है। इस प्रकार की परम्परायें हिमनदों, हिमतालाबों, बुग्यालों एवं इन पर अवलम्बित वनस्पतियों और जीव जन्तुओं और वहां धरती की सुरक्षा के लिए बनाये गए होंगे।

क्योंकि मध्य हिमालय पहले से ही बहुत संवेदनशील है, उपर से यहां होने वाले छोटे-बड़े भूकम्प इसकी संवेदनशीलता को और बढ़ाते रहते हैं। पिछली शताब्दी के अन्तिम दशक में सन 1991 का उत्तरकाशी भूकम्प, 1999 का चमोली भूकम्प, जो दोनों 6 रिचर से अधिक मापे गए थे, ने बहुत तबाही मचाई थी। इनके अलावा छोटे-छोटे भूकम्प तो आये दिन आते रहते हैं। इन छोटे भूकम्पों के कारण लोगों को प्रत्यक्षतः क्षति भले ही न दिखे लेकिन इसका प्रभाव देर-सबेर हिमनदों, हिमनिर्मित तालाबों, नदियों, चट्टानों तथा जंगलों पर तो पड़ता ही है, जो प्रकोपों के विभिन्न रूपों में समय-समय पर प्रकट होते रहते हैं। जिसे हम प्राकृतिक विपदा का नाम दे देते हैं। इसका उदाहरण मध्य हिमालय में 1893 में बिरही नदी में पहाड़ के टूटने से बनी झील, जो बिरही ताल के नाम से जानी जाती है, एक साल बाद टूटी जिसका प्रभाव बिरही ताल से लेकर हरद्वार तक पड़ा लेकिन तत्कालिन प्रशासन की सावधानी से मानव क्षति नहीं हुई और इसे प्राकृतिक आपदा माना जा सकता है। सन 1970 मंे अलकनन्दा में प्रलयंकारी बाढ़ आयी थी। उस समय चमोली जिले के कुंवारी पास के आसपास एक दिन में 18 ईंच बारिस होने की जानकारी मिली, जिसमें कुंवारी पास के आर-पार बहने वाली नदियों में भारी नुकसान हुआ। इसमें श्रृषिगंगा से लेकर हरद्वार तक 6 मोटर पुल, 16 पैदल पुल, 10 किलोमीटर मोटर मार्ग नष्ट हुआ, दर्जनों लोगों की मौत हुई, 25 बसें बही, 500 एकड़ के करीब खेती नष्ट हुई, सैकड़ों पशु भी मारे गए। हरद्वार से आगे अपर गंगा नहर 10 किलोमीटर लम्बाई तक साद से पट गई थी। यह बाढ़ प्राकृतिक कम मानवकृत अधिक थी। इस बाढ़ का मुख्य कारण नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में पेड़ों की कटाई थी जिसके बाद वनों को बचाने के लिए चिपकों आंदोलन आरम्भ हुआ जिसके दबाव में जंगलों की कटाई रोकी गई, जिसे वैज्ञानिकों ने भी अपने अध्ययनों से स्वीकार किया। हिमालय की संवेदनशीलता को बढ़ाने में पिछली शताब्दी में वनों के विनाश का महत्वपूर्ण योगदान रहा।

पिछले तीन दशकों से इन क्षेत्रों में महाविकास के नाम पर संवेदनशील क्षेत्रों में बड़ी-बड़ी विद्युत परियोजनाओं के लिए चट्टानों को खोदकर, काटकर और टनल बनाकर इनकी संवेदनशीलता को और बढ़ावा मिला है। नदियों से छेड़छाड़ जारी है। इसके अलावा मोटर मार्ग का भी अनियोजित ढंग से विस्तार हो रहा है और इस सबसे खोदी गई मिट्टी का नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में ढेर लगाया गया।

जहां पहले हिमानियां पसरी रहती थी, घने जंगल थे, सुनसान बुंग्याल थे, उन क्षेत्रांे में अनियोजित ढंग से खोद-खोद कर मोटर मार्गों का जाल विछा दिया गया। ऐसे सुनसान वन प्रान्तों में रातों-रात बड़े-बड़े शहर बन गए। आबादी का कई गुना विस्तार हो गया। देखते ही देखते बढ़ती आबादी की जल, जमीन और उर्जा की आपूर्ति के लिए प्रकृति के साथ अनाप-शनाप बिना सोचे-समझे औषधीय पादपों के नाम पर छेड़खानी हुई। ग्रामीण विकास में क्षेत्रीय असंतुलन से आबादी का शहरों की ओर पलायन, आबादी का अस्थिर क्षेत्रों में विस्तार एक सामान्य बात हो गई। छोटी-बड़ी नदियों के आसपास तेजी के साथ अतिक्रमण भी हुआ।

इस सबसे जुझने के लिए राजनैतिक इच्छा शक्ति का लगातार नितान्त अभाव रहा।

ये सारी परिस्थितियां है, जिसका हिमालय और हिमालय से प्रवाहित नदियों पर दबाव बढ़ा है और उसकी बौखलाहट साल दर साल बढ़ रही है। पहले प्राकृतिक प्रकोप बीस तीस साल के अंतराल में होते थे, अब एक दो साल की अवधि में ही होने लगे हैं।

ये सारे दबाव है जिसके कारण हिमालय और यहां से उद्गमित नदियों की बौखलाहट में अभूतपूर्व बढ़ावा हुआ है और यहां के निवासियों की तबाही हो रही है। यदि अभी भी इन दबावों को कम करने की दिशा में एकीकृत कार्यक्रम राष्ट्रीय स्तर पर नहीं होते हैं तो आने वाले वर्षों में इससे भी भयंकर त्रासदी को नकारा नहीं जा सकता है।

इसके लिए यह आवश्यक है कि हिमालय के संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान हो। हिमनदों, हिमतालाबों में होने वाली हलचलों के बारे में निगरानी तंत्र खड़ा किया जाना चाहिए। हिमरेखा एवं उससे जुड़े बुग्यालों के आसपास निगरानी के साथ संवेदनशीलता को बढ़ाने वाली गतिविधियों को हतोत्साहित किया जाना चाहिए।

इन क्षेत्रों में बड़ी-बड़ी परियोजनाओं के निमार्ण का मोह छोड़ना पड़ेगा। पारिस्थितिकी के अनुरूप छोटी-छोटी परियोजनाओं का ही विस्तार होना चाहिए। निमार्ण कार्यो में भूमि भार वहन क्षमता आदि का ध्यान अवश्य रखा जाना चाहिए। इससे निकलने वाली मिट्टी तथा मलबे के निस्तारण का प्रबंध योजना निमार्ण के समय सही तरीके से होना चाहिए।

सड़क आदि के निमार्ण में मिट्टी-मलबे आदि के निस्तारण के साथ-साथ पानी के बहाव को नियंत्रित करने के लिए नाली, स्कबर आदि का समुचित प्रबंध साथ-साथ किया जाना चाहिए।

बर्षा और बर्फ की मारक क्षमता को कम करने के लिए प्राकृतिक जंगलों की उत्पादकता और सघनता बढ़ायी जानी चाहिए तथा नंगी एवं वृक्षविहीन धरती को हरियाली में बदलने के कार्यक्रम आरम्भ किए जाने चाहिए व इसके लिए जिम्मेदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

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सर्वोदय केन्द्र, मन्दिर मार्ग, गोपेश्वर, जिला चमोली, उत्तराखण्ड- पिन 246401

 
16 -17 जून 2013 की प्रलयंकारी बाढ़ से उत्तराखण्ड में प्रभावित नदिया।
क्र 0 सं0 नदी का नाम जिले का नाम जिसकी सीमा से उद्गमित होती है
1 मन्दाकिनी रूद्रप्रयाग
2 सोन गंगा रूद्रप्रयाग
3 मधु गंगा रूद्रप्रयाग
4 खिरौगाड़ चमोली
5 अलकनन्दा चमोली
6 दूध गंगा-मनपाई चमोली
7 भ्यूडार गंगा चमोली
8 नन्दाकिनी चमोली
9 पिण्डर बागेश्वर
10 भागीरथी उत्तरकाशी
11 भिलंगना टिहरी
12 सौरोगाड़ उत्तरकाशी
13 क्षीरगंगा उत्तरकाशी
14 धनारी गाड़़ उत्तरकाशी
15 यमुना उत्तरकाशी
16 अलगाड़़ टिहरी
17 पलीगाड़ टिहरी
18 बेलगंगा टिहरी
19 सरयू बागेश्वर
20 रामगंगा पिथौरागढ़
21 गोरी पिथौरागढ़
22 ऐलागाड़ पिथौरागाढ़
23 धौली पिथौरागढ़
24 काली पिथौरागढ़

 

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One thought on “उत्तराखण्ड की त्रासदीः यात्रा विवरण

  1. इतनी विस्तृत और दुर-वृतांत अनुवेषणा को एक बार नहीं ३-४ से अधिक बार पढ़ा तब अवल्ल तो समझ में आई। और इसको भलीभांति स्मरण में रख सकूं इसलिए भी पढना लाजमी था। इस संदर्भ को इतना व्यापक बनाने के लिए प्रत्येक-प्रत्येक सदस्य का आभार और आत्मसम्मान की अभिव्यक्ति न भी करुँ तो चल सकता है। क्योंकि पहले कभी हमने न इन्हें समय दिया और इन्होंने न इसका कोई लेख मांगा पर यदि इस संदर्भ को इस यांत्रिक समय में भी नहीं पढ़ा और अपनाया। तो चार्वाक दर्शन की मुख्य पंक्तियां तो है ही…………आगे हम जनता की मर्जी

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