विकास और विनाश का रिश्ता – चंडी प्रसाद भट्ट (1991)

हिमालय क्षेत्र में अक्तूबर 1991 में भीषण भूकंप आया था। उस त्रासदी के बाद तैयार की गई यह रिपोर्ट भूकंप से हुए भारी विनाश के लिए जिम्मेवार गलत नीतियों की पड़ताल करती है और अंधाधुंध विकास के दुष्परिणामों को लेकर चेताती है लेकिन जैसा कि जाहिर है, तब से लेकर आज तक हालात में ज्यादा बदलाव नहीं आया है। 

पिछले डेढ़ सौ वर्षों का इतिहास बताता है कि गंगा की मुख्य धारा अलकनंदा, जो कि काफी तेज बहती है, में हुए भू-स्खलन और उससे आई बाढ़ से श्रीनगर (गढ़वाल), जो कि एक समय में पंवार राजाओं की राजधानी थी, 1868 से पहले और 1868 में, 1880 और 1894 में चार बार नष्ट हुई थी। इसी प्रकार भागीरथी में सन् 1978 के गरारीधार के भू-स्खलन से उत्तरकाशी तक भयंकर तबाही हुई थी। उधर इस क्षेत्र में बड़े और मध्यम निर्माणकारियों और परियोजनाओं का एक सिलसिला जारी है। कई योजनाएं निर्माणाधीन भी हैं। इधर भूविज्ञानी चिल्ला-चिल्लाकर हिमालय पर्वत के विकास मान स्थिती में होने की बात कर रहे हैं।

“हमारे बर्तन उछलते थे, चूल्हें में रखा तवा बजता था। जब एक साथ सौ कारतूस के धमाके होते तो मकान पूरे कांप जाते थे। हां! एक लाभ हमें उन दिनों जरूर दिखा कि परियोजना के कारण सीमेंट सस्ता मिला और गांव के मकानों में धड़ाधड़ लेंटर पड़ गया। इसी लेंटर और धमाकों से पुराने कमजोर मकान टूटकर चूर-चूर हो गए। इसीलिए इतना विनाश हुआ।” यह बात 22 अक्टूबर 1991 की शाम को जामक गांव के एक वृद्ध ने कही। इसी गांव के शेरसिंह बताते हैं कि, “हमारा गांव उसी दौरान बहुत जर्जर लग रहा था। उत्तरकाशी से गंगोत्री मोटर मार्ग पर मनेरी जलविद्युत परियोजना के बैराज को पार करने के बाद लगभग पांच सौ मीटर की ऊंचाई पर भूमि के एक समतल हिस्से पर बसे जामक गांव में 20 अक्टूबर की सुबह आए प्रलयंकारी भूकंप से सर्वाधिक 71 व्यक्ति मारे गए। सैकड़ों पालतू पशु भी मारे गए और एक दर्जन व्यक्ति और पशु घायल हुए। 65 परिवारों के जामक गांव में केवल आठ परिवार ऐसे थे जिनके यहां जान का नुकसान नहीं हुआ।” इन भाग्यशाली परिवारों में से एक शेरसिंह का भी था। मैं और जगदीश तिवारी 22 अक्टूबर को दोपहर के बाद जब लोककवि घनश्याम शैलानी के साथ पहाड़ी पर चढ़ रहे थे तो गांव से लौटते हुए, पास के गांव का एक अधेड़ फूट-फूट कर रो रहा था। पता चला कि उसकी इस गांव में दो बेटियां व्याही हुई थी। दोनों इस हादसे में दब कर मर गईं। रास्ते में इससे गंगोत्री से आ रहे दल में मुखवा गांव की दो युवतियां सुबक-सुबक कर रो रही थी। पास के नेताला गांव में उनके रिश्तेदार दब कर मर गए थे।

जब हम गांव में पहुंचे, तो वहां लोग खेतों में झुरमुट बनाकर बैठे थे। सिर छिपाने के लिए पतली चादर की ओट थी। रो-रो कर आंखे सूजी थीं। बच्चों और गर्भवती महिलाओं की स्थिति बहुत ही चिंताजनक थी। एक स्थान पर तो खुले आसमान के नीचे दो युवक, जो अधेड़ लग रहे थे, ठंड से बचने के लिए एक दूसरे से सटकर बैठे थे। उस समय तक गांव के छह व्यक्ति गंभीर बीमार थे, जो हैलीकॉप्टर के आने की सूचना के कारण एक खेत मे लाए गए थे, लेकिन आखिर में सूचना मिली की हैलीकॉप्टर नहीं आएगा। हालांकि उस दिन तक उत्तरकाशी में महत्वपूर्ण नेताओं और अधिकारियों की भरमार हो गई थी, लेकिन कोई भी प्रशासनिक अधिकारी जामक नहीं पहुंचा था। गांव वालों ने बताया कि दवा तो पहुंच गई है, लेकिन पेट में अन्न न हो तो दवा कैसे असर करेगी? लोग आतंक और आक्रोश में थे, क्योंकि 22 अक्टूबर की सुबह प्रशासन की इसी लापरवाही से इस गांव में एक और व्यक्ति की मृत्यु हो गई थी। गांव वाले सैनिकों की प्रशंसा करते हुए थकते नहीं थे, जिन्होंने 20 तारीख की सुबह बिना किसी आदेश के इस घटना की जानकारी मिलते ही दबे हुए लोगों को निकाला और नदी से पानी लाकर पिलाया।

जामक गांव के खेतों के नीचे से मनेरी जलविद्युत परियोजना का निर्माण चल रहा था, तो उस समय कारतूसों का धमाका तो होना ही था। चट्टानें तो इस प्रकार के विस्फोटों से ही काटी जा सकती हैं। क्या कोई ऐसा भी तरीका हो सकता था कि निर्माण भी होता और धमाकों से चूल्हें पर रखा तवा भी नहीं बजता? शायद नहीं और इस विकास के युग में ग्रामीणों और गरीबों के तवों का बजना तो उनकी नियति हैं। इसलिए जब कोई हादसा हो तो राहत दौड़ लगती है और व्यवस्था भी रोना होती है। सावधानी बरतने की बात उतनी स्पष्ट दिखती नहीं हैं, जितनी कि राहत की। प्राकृतिक आपदाओं को रोकने में हम समर्थ नहीं हैं। पर उन्हें बढ़ाने का काम तो करते ही हैं। इसलिए यह राहत नहीं बल्कि मुआवजा माना जाना चाहिए। उत्तरकाशी जनपद में जामक के बाद अधिक जनहानि गवांणा, नैताल, रैथल, हीना व सैज में हुई। ये सभी गांव मोटर मार्ग से जुड़े हैं या इसके पास हैं। शेष गांवों में जनहानि इससे कम हुई थी, लेकिन प्रशासनिक उदासीनता का हाल कमोवेश एक जैसा था। मोटर मार्ग के समीप और मनेरी जल-विद्युत से सटे होने के कारण कारतूस के धमाकों से ये गांव तो जब-तब कांपते ही रहे थे।

भूकंप का असर भटवाड़ी से जुड़े हुए टिहरी जनपद के भिलंगना और जखोली विकासखंड और इससे जुड़े हुए चमोली जिले के केदारनाथ विकासखंड पर भी पड़ा। टिहरी जनपद में इस हादसे में 62 व्यक्ति मारे गए। लेकिन मकान काफी तबाह हुए हैं। अनुमान है कि साढ़े तीन हजार मकान पत्थरों के ढेरों में बदल गए हैं। ये रहने लायक नहीं रहे। चमोली जनपद के केदारनाथ में दो व्यक्ति मारे गए और एक दर्जन से ज्यादा व्यक्ति घायल हुए। इस जनपद में एक हजार पांच सौ से अधिक मकान नष्ट हुए। ऐतिहासिक केदारनाथ मंदिर की छतरी के तीन पाए अपनी जगह से हट गए हैं। इसी तरह त्रिजुगीनारायण मंदिर में दो स्थानों पर दरारें देखी गई हैं। केदारनाथ में पता चला कि भूकंप के कुछ ही क्षण बाद ग्लेशियर भी टूटे। लोगों ने बताया कि हनुमान-टाप के पास जब ग्लेशियर टूटा तो भयंकर आवाज के साथ प्रकाश और धुआं भी दिखाई दिया। साथ ही जगह-जगह चट्टानें भी टूटीं, जिनका टूटना बाद में भी जारी रहा। एक चट्टान टूटने से गौरीकुंड-केदारनाथ पैदल मार्ग पर कलकत्ता की दो यात्री महिलाएं 24 अक्टूबर को मारी गईं।

केदारनाथ मंदिर समिति के कार्याधिकारी महीधर सेमवाल, जो इस भूकंप ने केदारनाथ खोटा, सुमेरू पर्वत, केदार शिखर और इनकी गोद में बसे गांवों को झंझोड़ कर रख दिया। देश का ध्यान तो मुख्य रूप से जानमाल की हानि पर ही केंद्रित रहा। समझा जाता है कि इस भूकंप का असर, उच्च हिमालय में हिमखंडों और चट्टानों पर भी पड़ा होगा। इस प्रभाव की जानकारी देर-सबेर वहां से निकलने वाली नदियों से मिल ही जाएगी। एक और बात विचारणीय है कि इस भूकंप का केंद्र अल्मोड़ा था या जैसा बाद में प्रचारित हुआ उत्तरकाशी का ही स्थान अगोड़ा? साथ ही इसकी तीव्रता 6.01 या जैसा कि 20 अक्टूबर की बीबीसी ने अमेरिकी विशेषज्ञों का हवाला देते हुए इसकी शक्ती रियेक्टर पैमाने पर 7.01 की आशंका व्यक्त की थी। हम भी यहीं मानकर चल रहे थे कि यह 7.01 होगी, क्योंकि पूर्व में मध्य हिमालय में 1803 में आए भूकंप में ही जानमाल की हानि की जानकारी है जबकि 1803 के बाद यहां पर 26 मई 1816 को 6.05, 16 जून 1902 को 6.00, 13 जून 1906 को 5.56, 4 जून 1945 को 6.06, 18 दिसम्बर 1948 को 6.25, 31 दिसम्बर 1948 को 6.00, 22 जून 1961 को 5.8 माप के भूकंप अंकित किये गए थे। तब इस प्रकार की भयंकर तबाही की जानकारी नहीं है। 

असल में हम प्रकृति की गतिविधियों के सामने असहाय महसूस कर रहे हैं। भूकंप से उत्पन्न हुई प्रलंयकारी आपदा को सिर्फ प्राकृतिक आपदा समझ बैठे हैं क्या इस आपदा को बढ़ाने और उससे होने वाली जानमाल की हानि को कम किया जा सकता था? यह बात इस तथ्य से समझी जानी चाहिए कि उत्तरकाशी से भटवाड़ी के बीच सबसे अधिक जनहानि वाला क्षेत्र है, जहां पर पिछले तीन दशकों में परियोजना और विकास कार्यों के लिए अंधाधुंध धमाके हुए थे। व्यवस्था की नामसमझी से जिसे हम विकास समझ बैठे हैं असल में विकास नहीं है नहीं तो 30 वर्षों के अंतराल में आए एक माप के भूकंपों से इतना अधिक विनाश तो नहीं होना चाहिए था। पिछले तीन दशकों से हिमालय के इन अतंरवर्ती क्षेत्रों की संवेदनशीलता दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। भू-स्खलन और नदियों की बौखलाहट हर वर्ष बढ़ती जा रही है। 

पिछले डेढ़ सौ वर्षों का इतिहास बताता है कि गंगा की मुख्य धारा अलकनंदा, जो कि काफी तेज बहती है, में हुए भू-स्खलन और उससे आई बाढ़ से श्रीनगर (गढ़वाल), जो कि एक समय में पंवार राजाओं की राजधानी थी, 1868 से पहले और 1868 में, 1880 और 1894 में चार बार नष्ट हुई थी। इसी प्रकार भागीरथी में सन् 1978 के गरारीधार के भू-स्खलन से उत्तरकाशी तक भयंकर तबाही हुई थी। उधर इस क्षेत्र में बड़े और मध्यम निर्माणकारियों और परियोजनाओं का एक सिलसिला जारी है। कई योजनाएं निर्माणाधीन भी हैं। इधर भूविज्ञानी चिल्ला-चिल्लाकर हिमालय पर्वत के विकास मान स्थिती में होने की बात कर रहे हैं और बता रहे हैं कि इसमें भौगोलिक प्रक्रियाएं काफी तेजी से चल रही हैं इस बात को किसी भी प्रकार के निर्माण में अनदेखी नहीं किया जाना चाहिए। बड़ी परियोजनाओं का मोह इस हिमालयी भू-भाग में पूरी तरह से छोड़ देना चाहिए। साथ ही छोटे निर्माण के कार्यों में बेहद सावधानी बरतनी होगी कहीं ऐसा न हो कि लाभ मृगमरिचिका में हमारे संसाधन और प्रयास हमारे ही खिलाफ हो जाय। 

 

प्रकशित: 1991, जनसत्ता 

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