नियोजन का केंद्र बिंदु हिमालय का संरक्षण

उत्तराखंड के प्रख्यात पर्यावरणविद् और चिपको आंदोलन के प्रणोता चंडी प्रसाद भट्ट का मानना है कि हिमालयी क्षेत्र में नीति-नियंताओं को यह समझ बनानी होगी कि हिमालय की हिफाजत होती रहे। मानकों से हटकर निर्माण कायरे को टिकाऊ बनाए रखने के लिए हरियाली कार्यक्रम व्यापक स्तर पर संचालित होने चाहिए। हस्तक्षेप के लिए रजपाल बिष्ट ने उनसे मौजूदा हालातों और भविष्य के पु नर्निर्माण के सवालों पर विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत है, उसके प्रमुख अंश :-

मौजूदा प्राकृतिक विनाश के खतरे किन कारणों से सामने आ रहे हैं?

हिमालय अथवा उत्तराखंड के पिछले 200 साल के इतिहास पर नजर डालें तो 1803 के बाद ऐसा महापल्रय कभी नहीं आया था। इस तबाही से पूरा देश ही कांप उठा है। अब तक के उतार-चढ़ावों में आपदा का केंद्र कभी भागीरथी तो कभी अलकनंदा रही है और अब मंदाकिनी तथा पिंडर से लेकर काली नदियों ने भी अपना रौद्र रूप दिखाकर रख दिया है। केदारघाटी में मंदाकिनी ने हजारों जानें लेकर सबको स्तब्ध कर रख दिया है। बाकी नदियों ने पौराणिक काल से चली आ रही बस्तियों तथा कस्बों को मलबे में तब्दील कर पूरी मानव सभ्यता को झकझोर कर रख दिया है। नदियों एवं जल स्रेतों को पोषित करने वाले क्षेत्रों में वानस्पतिक आवरण नष्ट होने के कारण वर्षा का जल भूस्खलन को बढ़ावा दे रहा है। इसलिए भू क्षरण, भूस्खलन एवं परंपरागत जल-स्रेतों के सूखने का सिलसिला तेज होता जा रहा है। नंगी तथा वीरान धरती पर वानस्पतिक आवरण तैयार करने की ठोस कार्ययोजना बनाए जाने की आज सबसे बड़ी जरूरत है। भूस्खलन वाले क्षेत्रों पर विशेष नजर रखकर ऐसे क्षेत्रों को पहले ही नियंत्रित करने के लिए व्यावसायिक गतिविधियां प्रतिबंधित की जानी चाहिए। इसे रोकने के लिए परंपरागत तथा वैज्ञानिक दोनों प्रकार के तरीकों को अमल में लाया जाना चाहिए। मोटरमागरे के अंधाधुंध निर्माण से भी भूस्खलन के खतरे बढ़े हैं। इनका निर्माण भूस्खलन एवं भू कटाव के एक बड़े कारक के रूप में उभरा है। इसलिए मोटरमागरे का निर्माण आधा कटान और आधा भरान पद्वति के आधार पर करने के साथ ही मलबे के निस्तारण के लिए डंपिंग जोन स्थापित किये जाने चाहिए। चमोली-रांगतोली मार्ग के इस पद्धति के बन जाने से आज यह सड़क भूस्खलन के खतरे से दूर है। पर्वतीय क्षेत्रों के लिए योजना आयोग द्वारा सड़क निर्माण के लिए सातवीं पंचवर्षीय योजना में दी गई गाइडलाइन का सख्ती से अनुपालन होना चाहिए। वैसे भी उत्तराखंड के हिमनदों, हिमतालाबों, लैंड स्लाइड और संवेदनशील क्षेत्रों के व्यापक अध्ययन की पूरी जानकारी हमारे पास होनी चाहिए। उसी आधार पर सतर्कता भी बरती जानी चाहिए। इसके लिए एक राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय नेटवर्क तैयार कर लोगों को इस तरह के खतरों से आगाह करने के लिए व्यापक तंत्र खड़ा किया जाना चाहिए। आपदाओं से संबंधित सूचनाएं व प्री-अलार्म सिस्टम को डेवलप कर आपदा न्यूनीकरण में मदद मिल सकती है।

वर्षा की मारक क्षमता को किस तरह कम किया जा सकता है?

अस्थिर क्षेत्रों में निर्माण कार्य एवं उसके अवशिष्ट को बेतरतीब ढंग से जल धाराओं की ओर गिराने से ही नदियां बौखला रही हैं। इसलिए बारिश की बूंदों का रोकने का समुचित प्रबंध होना चाहिए। ये बूंदें समृद्वि के रूप में सामने आती हैं किंतु बारिश से उत्पन्न खतरों के प्रति उदासीनता बरतने के कारण ही वह विनाशक रूप में सामने आ रही हैं। वर्षा की मारक क्षमता कम करने के लिए संवेदनशील क्षेत्रों में छेड़खानी को कम किया जाना चाहिए। छोटे- बड़े नगरों तथा कस्बों में पानी की समुचित निकासी की व्यवस्था कर इस तरह की आपदा से काफी हद तक निजात मिल सकती है।

सामाजिक जागरूकता के माध्यम से क्या इस क्षेत्र में हरियाली कार्यक्रमों से प्राकृतिक तबाही रुकी है?

क्यों नहीं? चमोली जिले के मंडल नामक स्थान में 24 अप्रैल 1973 को हम सब लोगों ने वहां के सामाजिक कार्यकर्ता आलम सिंह बिष्ट की अध्यक्षता में एक बैठक कर जंगलों को बचाने के लिए चिपको आंदोलन की शुरुआत भावी खतरों को देखते हुए ही की थी। इसी का परिणाम है कि मंडल-चोपता-ऊखीमठ सड़क मार्ग 10,000 हजार फीट ऊंचे हिमालयी क्षेत्र से गुजरने के बाद भारी बरसात में भी कभी बंद नहीं होती। यह चिपको आंदोलन की एक बड़ी सफलता को दर्शाता है। इसी तरह, 1975 में जोशीमठ के अस्तित्व को बचाने के लिए डिग्री कॉलेज, गोपेश्वर के छात्रों तथा वन विभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों ने वहां डेरा जमाकर वातावरण का निर्माण किया। आज भी जोशीमठ के अस्तित्व पर प्रकृति ने मुसीबत खड़ी नहीं की है। इसके लिए ही आज भी हमारी चिपको आंदोलन की मातृ संस्था दशोली ग्राम स्वराज्य मंडल ग्रामीण क्षेत्रों में पर्यावरण एवं वन संवर्धन शिविरों का आयोजन कर लोगों को हरियाली के प्रति जागरूक करने में जुटी हुई है।

क्या हिमालय की नदियों पर बन रही जलविद्युत परियोजनाएं भी विनाश की प्रमुख वजह हैं ?

जल विद्युत परियोजनाएं निस्संदेह बाढ़ से भारी तबाही मचा रही हैं। परियोजनाओं द्वारा छोड़े गए मलबे के ढेरों के समुचित निस्तारण के लिए सख्ती से कदम उठाये जाने चाहिए। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी भी स्थिति में वह नदियों में न भरे। गांवों के नीचे से ऐसी परियोजनाओं के लिए सुरंगें कदापि नहीं खोदी जानी चाहिए। यही नहीं, इन बांधों को बनने से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए जिम्मेदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। भविष्य में बड़ी परियोजनाओं का निर्माण संवेदनशील क्षेत्रों में तत्काल बंद किया जाना चाहिए। हिमालय पर्वत जो देश की प्रमुख नदियों का उद्गम क्षेत्र है, वह आज भी विकासमान स्थिति में है। इसमें केंद्रीय भ्रंश समेत कई बड़े-छोटे और भ्रंश भी हैं। वैसे भी संवेदनशीलता के हिसाब से जोन-5 तथा जोन-4 के अंतर्गत होने से आने वाले भूकंप भी इसकी अस्थिरता को बढ़ाते रहते हैं। ऊपर से मानवीय गड़बड़ियों को नहीं रोका गया तो हमारा अस्तित्व ही सिमट कर रह जाएगा।

उत्तराखंड में जल पल्रय के पश्चात महाविनाश से निपटने के लिए पुर्ननिर्माण की प्रक्रिया कैसे शुरू की जानी चाहिए?

अब पूरे देश के नियोजन का केंद्र बिंदु हिमालय का संरक्षण होना चाहिए। प्रकृति के संरक्षण पर बल देकर टिकाऊ विकास की अवधारणा को साकार कर ही इस तबाही के बाद पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाना चाहिए। मौजूदा मानकों से हटकर निर्माण कायरे के टिकाऊ बने रहने के लिए आर्थिक एवं तकनीकी ज्ञान उदारतापूर्वक दिया जाना चाहिए। इस तबाही के बाद बचाव तथा राहत कार्यक्रम निपटने के पश्चात अब पुनर्निर्माण एक बड़ी चुनौती है। इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए हिमालय के संरक्षण की दिशा में ठोस कार्यक्रम लागू कि ये जाने चाहिए। 1991 तथा 1999 में उत्तरकाशी तथा चमोली में भूकंपों के कारण यह क्षेत्र बेहद संवेदनशील बन गया है और भूस्खलन की प्रक्रिया तेजी से वर्षो पुरानी बसागत का ही अस्तित्व समाप्त करती जा रही है। इसके लिए बिगड़े हुए पणढालों को हरियाली से आच्छादित करने का लोक कार्यक्रम खड़ा किया जाना चाहिए। अब तक आर्थिक विकास की नीतियां यहां की संवेदनशीलता तथा विविधता पूर्ण भौगोलिक स्थितियों को ध्यान में रखकर नहीं बनाई गई हैं। विकास की गतिविधियों का प्रमुख लक्ष्य मृदा व धरती की कमजोर संरचना को सुरक्षा प्रदान करना होना चाहिए। पुर्ननिर्माण में अब पीड़ित क्षेत्र के लोगों का पुरुषार्थ जगाना हमारी पहली कोशिश होनी चाहिए।सहायता वस्तु के रूप में दी जानी चाहिए। सरकार, संस्थाओं तथा व्यक्तिगत दान दाताओं के साथ ही क्षति की पूर्ति में पीड़ित व्यक्ति का अंश भी किसी न किसी रूप में शामिल होना चाहिए।

अब भविष्य की चुनौतियों से कैसे निपटा जा सकता है ?

ग्राम स्तर पर समितियों का गठन किया जाना चाहिए। इसमें ग्राम संगठनों के अलावा गांव अथवा पंचायत स्तर पर कार्यरत कर्मचारियों की जिम्मेदारी भी सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि आपदा आने पर वे स्वयं सक्रिय हो सकें। बचाव के लिए संपर्क साधनों की उपलब्धता भी सुनिश्चित होनी चाहिए। स्थानीय स्तर पर आपदा का सामना करने के लिए ग्रामीणों के प्रशिक्षु दल गठित होने चाहिए ताकि आपदाकाल में वे बचाव तथा राहत कार्यक्रमों से पहले से निपट सकें। यही नहीं, उन्हें क्षति के आकलन और राहत सामग्री के वितरण के अधिकार भी दिए जाने चाहिए।

मौजूदा तबाही से निपटने में क्या सरकार विफल नहीं रही?

इस तरह की आपदा से निपटने की नैतिक जिम्मेदारी सरकार की तो है ही किंतु हमें भी अपने भीतर का पुरुषार्थ जगाना होगा। लगातार आपदाओं से घिरे रहने के बावजूद प्रकृति की चुनौतियों से निपटने के लिए कोई ठोस तंत्र ही खड़ा नहीं हो पाया है। हम अपने रहन-सहन को प्रकृति के अनुरूप नहीं ढाल पाये हैं। इस आपदा के बाद तो अब और चेतने की जरूरत है। हमारे सामने विकास की नई चुनौतियां हैं और हमें उजड़े हुए लोगों की गृहस्थी बसाने की ओर पहला ध्यान केंद्रित करना होगा। हालांकि इन सबकी नैतिक जिम्मेदारी सरकार की है लेकिन सरकार के भरोसे रहने के बजाय हमें अपने खोए आत्मविश्वास को लौटाने की जरूरत भी है। आपदा को रोका तो नहीं जा सकता लेकिन इसके प्रभाव को कम तो किया ही जा सकता है। इसलिए हिमालय की सेहत को सुधारकर ही आपदाओं से बचाव संभव है। सरकार को भी गलतियों से सबक लेकर पुनर्वास के कार्यक्रमों को बेहद संजीदा ढंग से संचालित करना होगा।

-राष्ट्रीय सहारा, जुलाई 20, 2013 (Rashtriya Sahara, July 30, 2013)

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