टिकाऊ विकास, पर्यावरण संतुलन के साथ ही संभव

मैगसेसे अवॉर्ड विजेता और सुपरिचित पर्यावरणविद चंडी प्रसाद भट्ट चिपको आंदोलन के अगुआ माने जाते हैं। इनकी मान्यता है कि पर्यावरण संतुलन के साथ ही टिकाऊ विकास हो सकता है। स्वाति माथुर के साथ हुई एक बातचीत में चंडी प्रसाद ने उत्तराखंड में आई आपदा के कारणों का खुलासा किया है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के कुछ चुनिंदा अंश:

पिछले दिनों उत्तराखंड में आई बाढ़ को एक संभावित आपदा क्यों बताया जा रहा है?

वास्तव में, उत्तराखंड में जो घटना हुई है वह सिर्फ एक आपदा नहीं है। सच बात तो यह है कि परंपरागत रूप से उत्तराखंड ऐसा क्षेत्र है जहां बाढ़ आने की संभावनाएं बनी रहती हैं और यहां भू-स्खलन प्राय: होता रहता है। लेकिन इस समय जो आपदा आई है और विनाशकारी घटना घटी है उसके पीछे सबसे बड़ा कारण सरासर व्यवस्थागत लापरवाही है। गंभीर बात यह है कि भगीरथी और अलकनंदा ऐसी नदियां हैं जहां समय समय पर बाढ़ आती ही रहती है। हमने कई बार अनेक अधिकारियों और प्राधिकरणों को इस क्षेत्र में होने वाले नुकसान और इससे होने वाली समस्याओं से आगाह किया है।

विकास के नाम पर देवदार के पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और यहां के पहाड़ों को तोड़ने की वजह से भू-स्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं। स्थानीय अखबारों ने भी इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया है और हमने भी प्राधिकरणों को चेताया लेकिन इस पर ध्यान ही नहीं दिया गया। मेरे विचार में सही तरीके से पत्थरों की दीवारें बनाई जाएं और उन्हें चौड़ी सड़क के किनारे खड़ा किया जाए। यही सही तरीका है। अब हमें इस तरह के विकास को अवश्य सुनिश्चित करना होगा। तभी इससे आगे होने वाले नुकसानों को रोका जा सकेगा।

पर्यावरण से जुड़ी और किन-किन समस्याओं को कम किया जा सकता है?

यह बहुत अच्छा सवाल है। भविष्य में कोई नुकसान न हो इसके लिए पहाड़ों की सुरक्षा के लिए जल्द ही कुछ विशेष उपाय किए जाने की जरूरत है और यह वैज्ञानिक ढंग से ही हो सकता है। हिमालय के इस क्षेत्र में रहने वालों और यहां भ्रमण करने वालों को सावधान करने के लिए हमें कोई वॉर्निंग सिस्टम विकसित करना होगा। कुछ सरकारी एजेंसियों को इसके लिए खुद आगे बढ़कर काम करना होगा। उदाहरण के लिए, जिओलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जीएसआई), इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) और मौसम विभाग को आपस में मिलकर काम करना चाहिए।

जीएसआई, असुरक्षित अथवा अतिसंवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों का आसानी से पता लगा सकता है जबकि इसरो, सैटलाइट मैपिंग के माध्यम से इसकी दरारों को चिह्नित कर सकता है और उस पर निगरानी रख सकता है। मौसम विभाग पहले से ही खराब मौसम की चेतावनी दे सकता है। एक बार इस वॉर्निंग सिस्टम को प्रभाव में लाने के बाद, उत्तराखंड में होने वाले ऐसे नुकसानों को निश्चित रूप से रोका जा सकेगा। हालांकि योजनाएं बन चुकी हैं लेकिन दुर्भाग्यवश इन्हें अमल में फिलहाल नहीं लाया जा रहा है।

इस दिशा में क्या ऐसी कोई सक्षम कार्यप्रणाली है जो उत्तराखंड के निवासियों द्वारा अपनाई जा सके?

हां। हम वहां वृक्षारोपण के लिए लोगों को प्रोत्साहित करते हैं। गढ़वाल यहां का ऐसा पारंपरिक इलाका है जहां के लोग जलवायु परिवर्तन की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उदाहरण के लिए, वहां गांव के चारों ओर ड्रेनेज सिस्टम विकसित किया गया ताकि नदी का बहाव गांव की ओर न आए। लेकिन, बाद में आधुनिक विकास के साथ साथ यहां शहरी इलाके भी बसने लगे और इन इलाकों में हमारी बनाई एडवाइजरी को नहीं माना गया। इस बार जब बाढ़ आई तो यह इलाका पूरी तरह जलमग्न हो गया।

क्या आपने इस तरह की सलाह अथॉरिटीज को पहले दी है?

हां, हमने अथॉरिटीज को सलाह दी है कि टिकाऊ विकास सिर्फ पर्यावरण संतुलन के साथ ही संभव है। लेकिन उन्होंने हमारी सलाह को दरकिनार कर दिया। मौजूदा हालात में अब हर किसी को यह समझना होगा कि पहाडि़यों के मनोरम दृश्य से सिर्फ लाभ लेना एकतरफा सोच हो सकती है। हेमवती नंदन बहुगुणा, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी सरीखे नेताओं को जब लेटर लिखकर इस विकट स्थिति के बारे में बताया गया तो उन्होंने उस ओर ध्यान भी दिया था। बाद में तो सिर्फ हवाई सर्वे कर औपचारिकताएं पूरी कर ली जाती रहीं। जमीनी स्तर पर कोई खास ध्यान नहीं दिया जाता था। लेकिन अब इस दिशा में सर्वे के लिए हम सोनिया गांधी के आभारी हैं। मैंने एक पत्र लिखकर उनका आभार भी प्रकट किया है। लेकिन अब भी जमीनी स्तर पर काम करने के लिए बहुत सारे काम बचे हुए हैं जिन्हें पूरा करने की जरूरत है। वर्तमान में पर्यावरण असंतुलन के बुरे नतीजों के बारे में जागरूकता फैलाने के बावजूद गढ़वाल विकास मंडल निगम ने नदियों के तटों पर अपने गेस्ट हाउस और टूरिस्टों के लिए कॉटेज बना लिए हैं। यह प्रलय के दिनों का पूर्वाभास करा रहा है। बावजूद इसके हम इसे रोक नहीं पा रहे हैं। इससे आने वाले समय में आपदाओं में और बढ़ोतरी होगी।

 

-नवभारत टाइम्स, जुलाई 6, 2013 (Nav Bharat Times Jul 6, 2013)

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s