नदी तीर का रोखडा जत कत सौरों पार

पिछले पांच जून से मैं वरिष्ट पत्रकार श्री सुरत सिंह रावत तथा ओेमप्रकाश भट्ट के साथ उत्तरकाशी गंगोत्री तथा यमुनोत्री यात्रा पर गया था इस दौरान भैरोंघाटी से गंगोत्री के बीच का दृष्य देखकर हम स्तब्ध रह गए थे, देवदार के जंगलों से आच्छादित इस सुन्दर घाटी को रास्ता चैड़ीकरण के नाम से बूरी तरह से रौदा गया था। कारतूस के धमाकों से पहाड़ को तोड़ा जा रहा था जिसमें हजारों देवदार के पेड़ भी काटे गए तथा बड़ी-बड़ी मशीनों से पहाड़ को उलट-पुलट कर भागीरथी में गिराया जा रहा था। यही हाल भागीरथी की सहायक धारा जाड़ गंगा में भी यह हो रहा था।

भागीरथी घाटी की समस्याओं को समझने के लिए हमने 2007 में भी यात्रा की थी उस समय हमने सुझाव दिया था कि मोटर सड़क को यदि चैड़ा करना आवश्यक है तो खड्ड साईड में पत्थरों की दिवाल बनाकर सड़क चैड़ी की जानी चाहिए।

यह तो उत्तराखण्ड हिमालय में विनाश को बुलावा का एक उदाहरण है, उत्तराखण्ड में सौर-पिथौरोगढ़ से आराकोट बंगाण तक यह विनाश जहां तहां देखा जा सकता है। इसलिए जब सोलह तथा सत्तरह जून को उत्तरकाशी से श्री रावत जी का तथा उखीमठ से जिला पंचायत अध्यक्ष का टेलिफोन आया कि उत्तरकाशी और केदारनाथ में भारी विनाश हो गया है, मुझे आश्चर्य नही हुआ, मैने एकबारगी कहा कि यह तो होना ही था, मैं तब स्तब्ध रह गया जब पता चला कि केदारनाथ, रामबाणा, गौरीकुण्ड, सोनप्रयाग आदि स्थानों में देश के कोने कोने से आये हुए हजारों तीर्थयात्री मारे गए या लापता हुए। मैं तो उन्हें मात्र श्रदान्जली ही दे सकता हूं। लेकिन यह सवाल मुझे बार-बार कचोटता रहा कि क्या इस त्रासदी को हम रोक या कम कर सकते थे?

आज हजारों तीर्थ-यात्रियों के साथ सैकड़ों उत्तराखण्डवाशी भी इस त्रासदी में मारे गए या लापता हो गए हैं तथा तिलबाड़ा से लेकर केदारनाथ तक मंदाकिनी घाटी उजाड़ हो गई है। इससे उभरने में स्थानीय लोगों को भी बहुत समय लगेेगा। यह हाल न केवल मन्दाकिनी घाटी का है अपितु भागीरथी से लेकर काली नदी तक का है। अलकनन्दा की उपत्यका में भी बदरीनाथ से 15 किलोमीटर नीचे बेनाकुली के पास विष्णुप्रयाग परियोजना का बैराज नष्ट होने से बौखलायी अलकनन्दा ने गोविन्दघाट बिरही श्रीनगर आदि के कई भवनों को तहस-नहस कर दिया। इसी प्रकार लक्ष्मणगंगा के तूफान ने भ्यूडार घाटी को भी तहस नहस कर दिया। इन सुन्दर वादियों के साथ हमारा पुराना संबंध रहा है और कई बार इन वादियों के संरक्षण और संबद्र्वन के लिए हमकों आंदोलन भी चलाना पड़ा और जब इन वादियों में गड़बड़ी शुरू हुई तो न केवल इन वादियों के लिए अपितु पूरे उत्तराखण्ड को समझने के लिए हम सक्रिय हुए।

इस संदर्भ में तीन दशक पूर्व ‘‘ अधूरे ज्ञान और काल्पनिक विश्वास से हिमालय से छेड़खानी घातक’’ यह विवरण हमने सन 1982 में जब उत्तराखण्ड के अतिसंवेदनशील क्षेत्र बदरीनाथ से 15 कि.मी. नीचे लामबगड़ में अलकनन्दा को मोड़कर निमार्णाधीन विष्णुप्रयाग परियोजना को लेकर तैयार किया था। इसमें न केवल अलकनन्दा अपितु सम्पूर्ण उत्तराखण्ड के बारे में विवरण तैयार किया था और इस विवरण को तत्कालिन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरागांधी को देने के लिए गढ़वाल के सांसद श्री हेमवन्तीनन्दन बहुगुणा तथा कृषि विज्ञानी डा. एम.एस. स्वामीनाथन जी को दिया था। बहुगुणा जी ने तत्काल ही पत्र का उत्तर दिया जिसमें उन्होंने लिखा कि,

‘‘ आपका पत्र तथा रिपोर्ट पढ़ने को मिली धन्यवाद। आपने बड़े परिश्रम से कार्य किया है, इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं। मैं तो स्वयं ही पहाड़ों को तोड़ने, वनों के कटान आदि के खिलाफ हूं। जैसा कि स्वयं आपने लिखा है मैने अपने मुख्यमंत्रितत्वकाल में इस विनाश की ओर ध्यान दिया था मन है भी कुछ करना चाहता हूं अन्यथा यह पहाड़ तोड़-तोड़ कर ढेर बना देंगे। हम कही न होंगे। आपके सुझाव ठीक हैं स्थानीय जनमानस को भी तैयार करना होगा तभी कुछ हल निकलेगा, प्रधानमंत्री का ध्यान आकृष्ट कर रहा हूं।’’

बहुगुणा जी ने तत्कालिन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी को भी लिखा कि

’’उत्तराखण्ड में कतिपय बड़े-बड़े जलाशय एवं विद्युत परियोजनाओं पर सर्वेक्षण प्रस्तावित है। यहां से  उदगमित गंगा की मुख्यधारा अलकनन्दा, भगीरथी,यमुना,टोंस,  रामगंगा, काली, सरयु आदि अनेक सहायक नदियों के प्रवाह क्षेत्र में भू-क्षरण, भू-स्लखन एवं बाढ़ की स्थिति दिनों-दिन बिगड़ती जा रही है। इनके प्रवाह क्षेत्र की अस्थिरता के कारण सम्पूर्ण उत्तराखण्ड ही नहीं सारा देश इसकी चपेट में आ जाता रहा है। इनके द्वारा लायी गई मिट्टी से जलाशयों के समय पूर्व भर जाने का भी अंदेशा है। इस स्थिति में बाढ़ के भयंकर दुष्परिणामों को नकारा नहीं जा सकता है। इस क्षेत्र के वन, वनस्पतियों, जड़ी-बूटियों तथा कुटिर उद्योगों और भू-संरक्षण के आधार बने हुए हैं, जिसने पर्यावरण के संतुलन को कायम रखा हुआ है। सड़कों के जाल तथा विकास परियोजनाओं के नाम पर जिस प्रकार बेतहासा वनों का सफाया हो रहा है जिससे भूस्खलन, कृषि भूमि के कटाव, मकानों की क्षति और जनधन की व्यापक हानि होती रही है। विकास के लिए परियोजनाओं की नितान्त आवश्यकता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है किन्तु सही मायने में वहीं परियोजनाये सफल मानी जायेगी जो विनाश रहित होंगी। जिनके क्रियान्वयन से क्षेत्र की जनता को, प्र्राकृतिक सम्पदा को और क्षेत्र की रमणीयता को कोई क्षति न पहुंचती हो। श्री चण्डी प्रसाद भट्ट ने इस क्षेत्र की प्रस्तावित परियोजनाओं के संदर्भ में व्यापक रूप से चर्चा की है। मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आप इनके द्वारा प्रस्तुत किए गए सुझावों पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देंगी जिससे विकास के मनोहर स्वप्न में खोकर क्षेत्र की सुन्दरता नष्ट न हो। ग्रामीणों के मकान और आजिविका के साधन क्षतिग्रस्त न होने पाये। वन सम्पदा का अंघाघुंध सफाया न हो और परियोजनाओं के सुपरिणाम निकल सके।’’

इसके बाद भारत सरकार ने प्रो. एम.जी.के. मेनन की अध्यक्षता में बांधों, विद्युत परियोजनाओं तथा सिचाई परियोजनाओं के लिए टास्क फोर्स गठित किया था तथा अलकनन्दा के संवेदनशील क्षेत्र में विष्णुप्रयाग परियोजना के निमाण में जो आपत्तियां मैने उठायी थी उसके अनुसार भ्यूडार गंगा को अलकनन्दा में समाहित करने की योजना को विद्युत आथरिटी ने निरस्त कर दिया तथा दो दशक तक न केवल विष्णुप्रयाग अपितु श्रीनगर परियोजना स्थगित रही। जिसे बाद में पिछली शताब्दी के अंत में प्राईवेट कम्पनियों के हाथ में उत्तरप्रदेश सरकार ने सौप दिया था लेकिन आज इस परियोजना के लिए बना बैराज तो नष्ट हुआ ही उसके मलबे से अलकनन्दा बौखलायी जिससे लामबगड़, पाण्डुकेश्वर,गोविन्दघाट में दर्जनों मकान व वाहन नष्ट हुए। अलकनन्दा की बौखलाहट में आगे विरही में गढ़वाल मंडल का विश्राम गृह तथा श्रीनगर का निचला भाग भी दलदल से पट गया। आज राजनेता प्रशासक एवं टैक्नोक्रेट अपनी जिम्मेदारी से हाथ झाड़ते हुए प्रकृति को कोस रहे हैं कि अधिक बारिस से यह सब हुआ।

मुझे याद है कि सन 1956 के अक्टूबर महीने में पांच दिन तक तेज बारिस हुई, जगह-जगह भूस्खलन तो हुआ लेकिन जनधन की हानि नाममात्र की हुई। मुझे बचपन की याद है कि हमारे गांव में भारी बारिस के बाद न जलभराव और नहीं भूस्खलन की भयंकरता दिखी और तब गोपेश्वर की आबादी मुस्किल से पांच सौ के लगभग होगी। आज गोपेश्वर का विस्तार हो गया है और यहां की आबादी 15 हजार से अधिक होगई है।

आज के फैले हुए गोपेश्वर में बरसात के दिनों में टूट-फूट  एवं जलभराव की घटना यदा-कदा होती रहती है लेकिन जो पुराना गांव है उसमें अभी तक इस प्रकार की गड़बड़ी नही के बराबर है। आज से सैकड़ों साल पहले गोपेश्वर मन्दिर के दक्षिण दिशा की ओर  पूर्व में भूमिगत नाली पानी की निकासी के लिए बनी थी जिसमें जलभराव की नौबत ही नहीं आती।

पहले हिमालयी क्षेत्रों में गांव की रचना के साथ साथ मकानों के निमार्ण स्थल पर भी बहुत सावधानी बरती जाती थी। स्थल की मिट्टी को आधार मानकर निमार्ण की सहमति होती थी। उससे निमार्ण आरम्भ करने में सात सावन की कहावत प्रचलित थी। वुनियाद रखते समय श्रावण के महीने की सात दिन की बारिस के बाद जब जमीन बैठ जाती तो उससे फिर आगे कार्य किया जाता। उसमें दीवाल बनाते समय पत्थरों के जोड़-तोड़, गुडि़या, हुत्तर आदि का पूरा ध्यान रखा जाता था। मकानों के निमार्ण में भूमिधसांव एवं भूकम्प को सहने का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाता था। मकान के तीनों ओर से गैड़ा { पानी के प्रवाह की नाली} निकाला जाता था और उसकी सफाई का पूरा ध्यान रखा जाता था गांवों में बर्षात से पूर्व डांडा गूल की सफाई की जाती थी जिससे बारिस का पानी गांव के बीच न बहे और गांव का नुकसान न हो। जहां गांव ढाल पर बसे है वहां उपरी भाग में इस तरह की डांडा गूले बनायी जाती थी। बर्षा का पानी दोनों छोर से विना अवरोध के प्रवाहित हो जाय यह ध्यान न केवल गांव की बसासत में अपितु जितने भी पुराने तीर्थधाम है उनमें पानी के निकास के अलावा भूमि भार वहन क्षमता और स्थिरता नदी से दूरी आदि का पूरा ध्यान रखा जाता था। बदरीनाथ मन्दिर इसका उदाहरण है जिसमें बदरीनाथ के दोनों ओर एवलांच आदि से मकानों का नुकसान होता रहा किन्तु मन्दिर एवलांच एवं भूकम्प आने के बाद भी सुरक्षित है। कहा जाता है कि बदरीनाथ मन्दिर नारायण पर्वत के‘‘ आंख की भौं’’ वाले भाग के निचले भाग में स्थापित किया गया है’’ जिस कारण मन्दिर हिमस्खनों से सुरक्षित रहता आया है। यही ध्यान केदारनाथ मन्दिर के स्थापत्य में भी रखा गया है। 1991 के भूकम्प से केदारनाथ नगर में क्षति हुई लेकिन मन्दिर सुरक्षित रहा।

नदियों के किनारे बसासत नहीं होती थी। नदी से हमेसा दूरी का रिस्ता रखा जाता था। एक कहावत भी प्रचलित थी ‘‘ नदी तीर का रोखड़ा-जत कत सौरों पार ’’ नदी के किनारे की बसासत जब कभी भी नष्ट हो जाती हैै। इसलिए नदियों के किनारे की बसासत एवं खेती नितान्त अस्थाई रहती। वर्षात के मौसम में वहां रहना वर्जित जैसा था। यही कारण था कि गंगा की मुख्य धारा अलकनन्दा एवं उसकी सहायक धाराओं मे  सन 1970 से पूर्व कई बार प्रलयंकारी भूस्खलन हुए इनसे नदियों में अस्थायई झीले बनी जिनके टूटने से प्रलयंकारी बाढ़ आई पर उपरी क्षेत्रों में इन बाढ़ों से जन-धन की हानि ना के बराबर हुई। सन 1868 में अलकनन्दा की सहायक धारा-बिरही से आयी बाढ़ से लालसांगा {चमोली} में 73 यात्रियों के मारे जाने की जानकारी है। लेकिन इसके अलावा स्थानीय बस्तियों में मानव मृत्यु की जानकारी नहीं है। यही नहीं सन् 1894 की अलकनन्दा की प्रलयंकारी बाढ़ में भी केवल एक साधु की मौत की जानकारी है। भले ही खेत और सम्पति का भारी नुकसान हुआ हो, उसमें भी अलकनन्दा के उद्गम से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर श्रीनगर गढ़वाल में ही ज्यादा नुकसान होना बताया गया। एक समय में श्रीनगर राजाओं की राजधानी के साथ ही गढ़वाल का केन्द्रीय स्थल था इसलिए जनसंख्या के दबाव से नदी के विस्तार के अन्दर आबादी फैलती गई। अलकनन्दा के स्वभाव की अनदेखी की गईं।

सन 1950 के बाद उत्तराखण्ड में स्थित तीर्थ स्थानों, पर्यटक केन्द्रों एवं सीमा सुरक्षा की दृष्टि से मोटर सड़कों का जाल बिछा। अधिकांश सड़कें यहां की प्रमुख नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों से ले जाई गइ। इसी आधार पर पुरानी चट्टियों का आस्तित्व समाप्त हो गया और नए-नए बाजार रातों-रात खड़े हो गए। इनमें कई नये बाजार नदियों से सटकर खड़े हो गये। मोटर सड़क भी कई अस्थिर क्षेत्रों में खोदी गई, कारतूसों के धमाकों से ये और अस्थिर हो गये। सड़कों के आसपास के जंगलों का भी वेतहासा विनाश शुरू हुआ। उपर से नदियों द्वारा टो-कटिंग होता रहा।, इस सबका एकीकृत प्रभाव मोटर सड़क के आसपास की बसावट पर पड़ा।

इस प्रकार की घटना अलकनन्दा के अत्यन्त सम्वेदनशील क्षेत्र गरूड़गंगा से श्रृषिगंगा के संगम तक। 20 जुलाई 1970 को कुंवारी और चित्रकांठा ढांडा जो कि अलकनन्दा की सहायक धारा गरूड़गंगा,पातालगंगा, कर्मनाशा, ढाकनाला और रिंगी गाड़ का जलागम है तथा पूर्व के पणढाल में बिरही नदी का पणढाल हैं में 24 घंटे में 20 सेन्टीमीटर बारिष का होना बताया गया, जिसके कारण ये सभी नाले बौखलयें जिससे अस्थायी बांध बने और टूटे और इसकी जद में बेलाकूची, बिरही, छिनका आदि बाजार और बस्ती पूरी तरह से नष्ट हुई। सड़क पुल खेत आदि तो नष्ट हुए ही तीन सौ किलोमीटर दूर गंगा नहर भी हरिद्वार से पथरी तक सिल्ट से भर गई थी। श्रीनगर गढ़वाल में आई0टी0आई0 के भवन 6 फुट तक साद से पट गए थे तथा दर्जनों यात्री भी मारे गये थे। इसके बाद भी अलकनन्दा की अलग-अलग घाटियों में अगले वर्षों में भी भूस्खलन एवं बाढ़ से लगातार नुकसान होता रहा।

यह न केवल अलकनन्दा बल्कि काली नदी की सहायक धारा धौली-गौरी के पणढालों, तवाघाट-खेला- पलपला में भी वर्ष 1977 से भारी विनाश हुआ जिसमें जन-धन का अपार नुकसान हुआ। बहुत बड़ा इलाका अस्थिर घोषित किया गया। आगे यह क्रम लगातार जारी है। इसी प्रकार भागीरथी घाटी में भी 1978 की गरारी धार के भूस्खलन से बनी झीलों एवं उनके टूटने से टिहरी तक भारी तबाही हुई थी। आगे भी यह क्रम न केवल भागीरथी घाटी में अपितु उत्राखण्ड के अलग-अलग भागों में जारी रहा। सन 1991 एवं 1999 के भूकम्पों से इस भाग में कई भूस्खलन सक्रिय हुए तथा कई क्षेत्रों में दरारें विकसित हुई कई भूभाग सदा के लिए अस्थिर हुए जिसके कारण बरूणावत की जैसी त्रासदी हमारे सामने है जो थमने का नाम नहीं ले रहे। पिछले तीन दशकों में उत्तराखण्ड के गांव गांव को मोटर मार्ग से जोड़ने की महत्वाकाक्षा हमारी रही। एक दर्जन के लगभग राष्ट्रीय एवं राज्य मार्गो  का निमार्ण एवं विस्तारीकरण के अलावा गांवों को जोड़ने के लिए एक हजार से अधिक छोटी-बड़ी मोटर सड़कों का निमार्ण किया गया। मोटर मार्गों के लिए पहाड़ों को काट कर एवं खोद कर मिट्टी एवं चट्टानों को निचले भाग में बेतरतीब ढंग से फेंका जाता रहा। जो निचले क्षेत्र के आबादी एवं कृषि भूमि को बारिष आने पर दल-दल से पाट रही है।

इसी प्रकार जिन-जिन गांवों के नीचे से सुरंगों का निमार्ण हो रहा है साथ ही कारतूस के धमाकों के कम्पन से गांवों की अस्थिरिता भी बढ़ती जा रही है। चमोली जिले का चाई गांव इसका जीता-जागता उदाहरण है। विष्णुप्रयाग जल विद्युत परियोजना के विद्युत गृह के उपरी भाग में स्थित चाई गांव की उजड़ी हुई बस्ती इसकी गवाह है।

इसी प्रकार मनेरी विद्युत परियोजना के लिए बनी सुरंग के उपर स्थित जामक गांव जहां पर 1991 के भूकम्प में सबसे अधिक लोग मारे गए थे। इसी तरह कफकोट क्षेत्र में बढ़ता भूस्खलन और तबाही इस बात के प्रत्यछ उदाहरण है। तपोवन के आसपास के गांव भी विद्युत परियोजना के कारण संकटग्रस्त है।

पहाड़ों में हो रहे भूस्खलन और बाढ़ का का प्रभाव अब सीधे सीधे मैदानों में पड़ता साफ दिखाई दे रहा है। यमुना, भागीरथी, अलकनन्दा, रामगंगा, कोशी के मैदानी क्षेत्र भी अब डूब एवं जलभराव की परधि में आ गए हैं। नदियों का तल उठने से उत्तराखण्ड के तराई क्षेत्र उत्तरप्रदेश, पंजाब, हरियाणा दिल्ली की नदी तीर की बस्तियां अब अधिक तेजी के साथ जलभराव एवं बाढ़ की चपेट में रहे हैं। इससे पहाड़ों समेत मैदानों में भी लाखो लोग तबाही का शिकार हो रहे हैं और विकाश परियोजनायें भी नष्ट हो रही हैं।इस त्रासदी को केवल प्रकृति पर ही नहीं अपितु अनियोजित विकास तथा हमारे द्वारा थोपी गई गड़बड़ी भी जिम्मेदार है।

बारिष का क्रम कभी ज्यादा कभी कम होता रहेगा। आवश्यकता है आज बारिष की मारक क्षमता को कम करना। इसकी मारक क्षमता कैसे कम से कम हो जिससे इस प्रकार की त्रासदी कम से कम हो इस बात पर चिन्तन व कार्यक्रम बनाने की आज सख्त जरूरत है।

इसके लिए पहली बात तो योजनाकारों एवं प्रशासकों व राजनेताओं को यह समझ बनानी होगी कि देश के नियोजन का केन्द्र बिन्दू हिमालय का संरक्षण होना चाहिए। इसके लिए मानकों से हटकर निमार्ण कर्यों के टिकाऊ बने रहने के लिए आर्थिक एवं तकनीकी ज्ञान उदारता पूर्वक दिया जाना चाहिए। इसके लिए जिम्मदारी भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

नदियों,नालों एवं गदेरों में बहने वाली साद की मात्रा इस बात की ओर संकेत कर रही है कि इसे अतिप्राथिमिकता के आधार पर नहीं रोका गया तो इसके भयंकर दुष्परिणाम आगे भी आते रहेंगे। इसके लिए बिगड़े हुए पणढ़ालों में छोटी एवं बड़ी वनस्पति से आच्छादित करने का लोक कार्यक्रम खड़ा किया जाना चाहिए। इन पणढालों में लगने वाली आग को सख्ती के साथ रोकने के लिए ग्राम समुदाय को जिम्मेदारी दी जानी चाहिए। हरियाली का सीधा प्रभाव पणढालों के सम्बद्र्वन पर कैसा पड़ता है यह गोपेश्वर-चोप्ता मोटर मार्ग के बीच मण्डल के जंगल वाले क्षेत्र में देखा जा सकता है जहां अतिवृष्टि के बाद भी भूस्खलन एवं टूट-फूट ना के बराबर होती है। इस बार भी इतनी बारिष के बाद भी यह मार्ग चालू रहा। इस जंगल के लिए सन 1973 में चिपकों आंदोलन आरम्भ हुआ था।

अस्थिर, दरारों एवं भूस्खलन से प्रभावित इलाकों को चिन्हित किया जाना चाहिए।  ऐसे इलाकों की पहचान कर छेड़-छाड़ नहो,इन्हें विश्राम दिया जाना चाहिए। इन पर निगरानी रखी जानी चाहिए। अतिवृष्टि के समय इनमें होने वाली गतिविधियों के लिए चेतावनी तंत्र विकसित किया जाना चाहिए।

मोटर मार्गों के निमार्ण में आधा कटान, नीचले क्षेत्रों में पत्थर की दीवाल बनाकर भरान हो। जिससे नीचे के क्षेत्रों में मलबा न बहे। इसके लिए योजना आयोग द्वारा पर्वतीय क्षेत्रों के लिए सड़क निमार्ण हेतु सातवीं पंचवर्षीय योजना में दी गई गाईडलाईन का सख्ती से अनुपालन किया जाना सुनिश्चित हो। इसका एक उदाहरण चमोली-रांगतोली मोटर मार्ग के निमार्ण में देखा जा सकता है। जिसका वहां की स्थानीय बस्ती चमोली के लोगों की जागरूकता से अनुपालन सम्भव हो सका।

सड़क निमार्ण के दौरान ही स्कपरों का पानी खडि़चानुमा नालियों के द्वारा निकास किया जाना चाहिए। मोटर सड़क से जुड़े गाड़-गदेरो एवं नालों का सुधार भी आवश्यक है। जिनकी बौखलाहट से सड़के और आबादी ध्वस्त हो जाती है।

छोटे-बड़े बाजारों नगरों के पानी की समुचित निकास की व्यवस्था की जानी चाहिए। जलविद्युत परियोजनाओं द्वारा छोड़े गए मलबे के ढेरों के समुचित निस्तारण हेतु सख्ती से कदम उठाये जाने चाहिए। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी भी स्थिति में वह नदियों में न बहे। गांवों के नीचे से परियोजनाओं के लिए सुरंग न खोदी जाय।

निर्मित बांधों के द्वारा होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए जिम्मेदारियां सुनिश्चित की जानी चाहिए।

आगे बड़ी परियोजनाओं का निमार्ण तत्काल बन्द किया जाना चाहिए।

हिमालय पर्वत जो देश की प्रमुख नदियों का उद्गम क्षेत्र है, कहा जाता है कि वह आज भी विकासमान स्थिति में हैं। इसमें मुख्य केन्द्रीय-भ्रंश सहित कई बड़े छोटे और भ्रंश भी हैं तथा जोन 5, जोन 4 के अन्तगर्त होने से आने वाले भूकम्प भी इसकी अस्थिरिता को बढ़ाते रहते हैं। उपर से मानवीय गड़बडि़यो को नहीं रोका गया तो नदियां बौखलायेगी तो वह इस त्रासदी से भी भयंकरतम त्रासदी होगी फिर हम इसे व्यवस्थाजनित कारस्तानी स्वीकार करने के बजाय गंगा और उसकी सहायक धाराओं को कोसेंगे। आज आवश्यकता है प्रकृति के संरक्षण एवं लोगों के कल्याण के बीच समन्वय स्थापित करने की, जिससे टिकाऊं विकास का मार्ग प्रसस्त हो।

– (दैनिक जागरण ३० जून २०१ ३  को प्रकाशित)Dainik Jagran, 30 June 2012 New Delhi

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s