विकास और विनाश का रिश्ता – चंडी प्रसाद भट्ट (1991)

हिमालय क्षेत्र में अक्तूबर 1991 में भीषण भूकंप आया था। उस त्रासदी के बाद तैयार की गई यह रिपोर्ट भूकंप से हुए भारी विनाश के लिए जिम्मेवार गलत नीतियों की पड़ताल करती है और अंधाधुंध विकास के दुष्परिणामों को लेकर चेताती है लेकिन जैसा कि जाहिर है, तब से लेकर आज तक हालात में ज्यादा बदलाव नहीं आया है। 

पिछले डेढ़ सौ वर्षों का इतिहास बताता है कि गंगा की मुख्य धारा अलकनंदा, जो कि काफी तेज बहती है, में हुए भू-स्खलन और उससे आई बाढ़ से श्रीनगर (गढ़वाल), जो कि एक समय में पंवार राजाओं की राजधानी थी, 1868 से पहले और 1868 में, 1880 और 1894 में चार बार नष्ट हुई थी। इसी प्रकार भागीरथी में सन् 1978 के गरारीधार के भू-स्खलन से उत्तरकाशी तक भयंकर तबाही हुई थी। उधर इस क्षेत्र में बड़े और मध्यम निर्माणकारियों और परियोजनाओं का एक सिलसिला जारी है। कई योजनाएं निर्माणाधीन भी हैं। इधर भूविज्ञानी चिल्ला-चिल्लाकर हिमालय पर्वत के विकास मान स्थिती में होने की बात कर रहे हैं।

“हमारे बर्तन उछलते थे, चूल्हें में रखा तवा बजता था। जब एक साथ सौ कारतूस के धमाके होते तो मकान पूरे कांप जाते थे। हां! एक लाभ हमें उन दिनों जरूर दिखा कि परियोजना के कारण सीमेंट सस्ता मिला और गांव के मकानों में धड़ाधड़ लेंटर पड़ गया। इसी लेंटर और धमाकों से पुराने कमजोर मकान टूटकर चूर-चूर हो गए। इसीलिए इतना विनाश हुआ।” यह बात 22 अक्टूबर 1991 की शाम को जामक गांव के एक वृद्ध ने कही। इसी गांव के शेरसिंह बताते हैं कि, “हमारा गांव उसी दौरान बहुत जर्जर लग रहा था। उत्तरकाशी से गंगोत्री मोटर मार्ग पर मनेरी जलविद्युत परियोजना के बैराज को पार करने के बाद लगभग पांच सौ मीटर की ऊंचाई पर भूमि के एक समतल हिस्से पर बसे जामक गांव में 20 अक्टूबर की सुबह आए प्रलयंकारी भूकंप से सर्वाधिक 71 व्यक्ति मारे गए। सैकड़ों पालतू पशु भी मारे गए और एक दर्जन व्यक्ति और पशु घायल हुए। 65 परिवारों के जामक गांव में केवल आठ परिवार ऐसे थे जिनके यहां जान का नुकसान नहीं हुआ।” इन भाग्यशाली परिवारों में से एक शेरसिंह का भी था। मैं और जगदीश तिवारी 22 अक्टूबर को दोपहर के बाद जब लोककवि घनश्याम शैलानी के साथ पहाड़ी पर चढ़ रहे थे तो गांव से लौटते हुए, पास के गांव का एक अधेड़ फूट-फूट कर रो रहा था। पता चला कि उसकी इस गांव में दो बेटियां व्याही हुई थी। दोनों इस हादसे में दब कर मर गईं। रास्ते में इससे गंगोत्री से आ रहे दल में मुखवा गांव की दो युवतियां सुबक-सुबक कर रो रही थी। पास के नेताला गांव में उनके रिश्तेदार दब कर मर गए थे।

जब हम गांव में पहुंचे, तो वहां लोग खेतों में झुरमुट बनाकर बैठे थे। सिर छिपाने के लिए पतली चादर की ओट थी। रो-रो कर आंखे सूजी थीं। बच्चों और गर्भवती महिलाओं की स्थिति बहुत ही चिंताजनक थी। एक स्थान पर तो खुले आसमान के नीचे दो युवक, जो अधेड़ लग रहे थे, ठंड से बचने के लिए एक दूसरे से सटकर बैठे थे। उस समय तक गांव के छह व्यक्ति गंभीर बीमार थे, जो हैलीकॉप्टर के आने की सूचना के कारण एक खेत मे लाए गए थे, लेकिन आखिर में सूचना मिली की हैलीकॉप्टर नहीं आएगा। हालांकि उस दिन तक उत्तरकाशी में महत्वपूर्ण नेताओं और अधिकारियों की भरमार हो गई थी, लेकिन कोई भी प्रशासनिक अधिकारी जामक नहीं पहुंचा था। गांव वालों ने बताया कि दवा तो पहुंच गई है, लेकिन पेट में अन्न न हो तो दवा कैसे असर करेगी? लोग आतंक और आक्रोश में थे, क्योंकि 22 अक्टूबर की सुबह प्रशासन की इसी लापरवाही से इस गांव में एक और व्यक्ति की मृत्यु हो गई थी। गांव वाले सैनिकों की प्रशंसा करते हुए थकते नहीं थे, जिन्होंने 20 तारीख की सुबह बिना किसी आदेश के इस घटना की जानकारी मिलते ही दबे हुए लोगों को निकाला और नदी से पानी लाकर पिलाया।

जामक गांव के खेतों के नीचे से मनेरी जलविद्युत परियोजना का निर्माण चल रहा था, तो उस समय कारतूसों का धमाका तो होना ही था। चट्टानें तो इस प्रकार के विस्फोटों से ही काटी जा सकती हैं। क्या कोई ऐसा भी तरीका हो सकता था कि निर्माण भी होता और धमाकों से चूल्हें पर रखा तवा भी नहीं बजता? शायद नहीं और इस विकास के युग में ग्रामीणों और गरीबों के तवों का बजना तो उनकी नियति हैं। इसलिए जब कोई हादसा हो तो राहत दौड़ लगती है और व्यवस्था भी रोना होती है। सावधानी बरतने की बात उतनी स्पष्ट दिखती नहीं हैं, जितनी कि राहत की। प्राकृतिक आपदाओं को रोकने में हम समर्थ नहीं हैं। पर उन्हें बढ़ाने का काम तो करते ही हैं। इसलिए यह राहत नहीं बल्कि मुआवजा माना जाना चाहिए। उत्तरकाशी जनपद में जामक के बाद अधिक जनहानि गवांणा, नैताल, रैथल, हीना व सैज में हुई। ये सभी गांव मोटर मार्ग से जुड़े हैं या इसके पास हैं। शेष गांवों में जनहानि इससे कम हुई थी, लेकिन प्रशासनिक उदासीनता का हाल कमोवेश एक जैसा था। मोटर मार्ग के समीप और मनेरी जल-विद्युत से सटे होने के कारण कारतूस के धमाकों से ये गांव तो जब-तब कांपते ही रहे थे।

भूकंप का असर भटवाड़ी से जुड़े हुए टिहरी जनपद के भिलंगना और जखोली विकासखंड और इससे जुड़े हुए चमोली जिले के केदारनाथ विकासखंड पर भी पड़ा। टिहरी जनपद में इस हादसे में 62 व्यक्ति मारे गए। लेकिन मकान काफी तबाह हुए हैं। अनुमान है कि साढ़े तीन हजार मकान पत्थरों के ढेरों में बदल गए हैं। ये रहने लायक नहीं रहे। चमोली जनपद के केदारनाथ में दो व्यक्ति मारे गए और एक दर्जन से ज्यादा व्यक्ति घायल हुए। इस जनपद में एक हजार पांच सौ से अधिक मकान नष्ट हुए। ऐतिहासिक केदारनाथ मंदिर की छतरी के तीन पाए अपनी जगह से हट गए हैं। इसी तरह त्रिजुगीनारायण मंदिर में दो स्थानों पर दरारें देखी गई हैं। केदारनाथ में पता चला कि भूकंप के कुछ ही क्षण बाद ग्लेशियर भी टूटे। लोगों ने बताया कि हनुमान-टाप के पास जब ग्लेशियर टूटा तो भयंकर आवाज के साथ प्रकाश और धुआं भी दिखाई दिया। साथ ही जगह-जगह चट्टानें भी टूटीं, जिनका टूटना बाद में भी जारी रहा। एक चट्टान टूटने से गौरीकुंड-केदारनाथ पैदल मार्ग पर कलकत्ता की दो यात्री महिलाएं 24 अक्टूबर को मारी गईं।

केदारनाथ मंदिर समिति के कार्याधिकारी महीधर सेमवाल, जो इस भूकंप ने केदारनाथ खोटा, सुमेरू पर्वत, केदार शिखर और इनकी गोद में बसे गांवों को झंझोड़ कर रख दिया। देश का ध्यान तो मुख्य रूप से जानमाल की हानि पर ही केंद्रित रहा। समझा जाता है कि इस भूकंप का असर, उच्च हिमालय में हिमखंडों और चट्टानों पर भी पड़ा होगा। इस प्रभाव की जानकारी देर-सबेर वहां से निकलने वाली नदियों से मिल ही जाएगी। एक और बात विचारणीय है कि इस भूकंप का केंद्र अल्मोड़ा था या जैसा बाद में प्रचारित हुआ उत्तरकाशी का ही स्थान अगोड़ा? साथ ही इसकी तीव्रता 6.01 या जैसा कि 20 अक्टूबर की बीबीसी ने अमेरिकी विशेषज्ञों का हवाला देते हुए इसकी शक्ती रियेक्टर पैमाने पर 7.01 की आशंका व्यक्त की थी। हम भी यहीं मानकर चल रहे थे कि यह 7.01 होगी, क्योंकि पूर्व में मध्य हिमालय में 1803 में आए भूकंप में ही जानमाल की हानि की जानकारी है जबकि 1803 के बाद यहां पर 26 मई 1816 को 6.05, 16 जून 1902 को 6.00, 13 जून 1906 को 5.56, 4 जून 1945 को 6.06, 18 दिसम्बर 1948 को 6.25, 31 दिसम्बर 1948 को 6.00, 22 जून 1961 को 5.8 माप के भूकंप अंकित किये गए थे। तब इस प्रकार की भयंकर तबाही की जानकारी नहीं है। 

असल में हम प्रकृति की गतिविधियों के सामने असहाय महसूस कर रहे हैं। भूकंप से उत्पन्न हुई प्रलंयकारी आपदा को सिर्फ प्राकृतिक आपदा समझ बैठे हैं क्या इस आपदा को बढ़ाने और उससे होने वाली जानमाल की हानि को कम किया जा सकता था? यह बात इस तथ्य से समझी जानी चाहिए कि उत्तरकाशी से भटवाड़ी के बीच सबसे अधिक जनहानि वाला क्षेत्र है, जहां पर पिछले तीन दशकों में परियोजना और विकास कार्यों के लिए अंधाधुंध धमाके हुए थे। व्यवस्था की नामसमझी से जिसे हम विकास समझ बैठे हैं असल में विकास नहीं है नहीं तो 30 वर्षों के अंतराल में आए एक माप के भूकंपों से इतना अधिक विनाश तो नहीं होना चाहिए था। पिछले तीन दशकों से हिमालय के इन अतंरवर्ती क्षेत्रों की संवेदनशीलता दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। भू-स्खलन और नदियों की बौखलाहट हर वर्ष बढ़ती जा रही है। 

पिछले डेढ़ सौ वर्षों का इतिहास बताता है कि गंगा की मुख्य धारा अलकनंदा, जो कि काफी तेज बहती है, में हुए भू-स्खलन और उससे आई बाढ़ से श्रीनगर (गढ़वाल), जो कि एक समय में पंवार राजाओं की राजधानी थी, 1868 से पहले और 1868 में, 1880 और 1894 में चार बार नष्ट हुई थी। इसी प्रकार भागीरथी में सन् 1978 के गरारीधार के भू-स्खलन से उत्तरकाशी तक भयंकर तबाही हुई थी। उधर इस क्षेत्र में बड़े और मध्यम निर्माणकारियों और परियोजनाओं का एक सिलसिला जारी है। कई योजनाएं निर्माणाधीन भी हैं। इधर भूविज्ञानी चिल्ला-चिल्लाकर हिमालय पर्वत के विकास मान स्थिती में होने की बात कर रहे हैं और बता रहे हैं कि इसमें भौगोलिक प्रक्रियाएं काफी तेजी से चल रही हैं इस बात को किसी भी प्रकार के निर्माण में अनदेखी नहीं किया जाना चाहिए। बड़ी परियोजनाओं का मोह इस हिमालयी भू-भाग में पूरी तरह से छोड़ देना चाहिए। साथ ही छोटे निर्माण के कार्यों में बेहद सावधानी बरतनी होगी कहीं ऐसा न हो कि लाभ मृगमरिचिका में हमारे संसाधन और प्रयास हमारे ही खिलाफ हो जाय। 

 

प्रकशित: 1991, जनसत्ता 

नियोजन का केंद्र बिंदु हिमालय का संरक्षण

उत्तराखंड के प्रख्यात पर्यावरणविद् और चिपको आंदोलन के प्रणोता चंडी प्रसाद भट्ट का मानना है कि हिमालयी क्षेत्र में नीति-नियंताओं को यह समझ बनानी होगी कि हिमालय की हिफाजत होती रहे। मानकों से हटकर निर्माण कायरे को टिकाऊ बनाए रखने के लिए हरियाली कार्यक्रम व्यापक स्तर पर संचालित होने चाहिए। हस्तक्षेप के लिए रजपाल बिष्ट ने उनसे मौजूदा हालातों और भविष्य के पु नर्निर्माण के सवालों पर विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत है, उसके प्रमुख अंश :-

मौजूदा प्राकृतिक विनाश के खतरे किन कारणों से सामने आ रहे हैं?

हिमालय अथवा उत्तराखंड के पिछले 200 साल के इतिहास पर नजर डालें तो 1803 के बाद ऐसा महापल्रय कभी नहीं आया था। इस तबाही से पूरा देश ही कांप उठा है। अब तक के उतार-चढ़ावों में आपदा का केंद्र कभी भागीरथी तो कभी अलकनंदा रही है और अब मंदाकिनी तथा पिंडर से लेकर काली नदियों ने भी अपना रौद्र रूप दिखाकर रख दिया है। केदारघाटी में मंदाकिनी ने हजारों जानें लेकर सबको स्तब्ध कर रख दिया है। बाकी नदियों ने पौराणिक काल से चली आ रही बस्तियों तथा कस्बों को मलबे में तब्दील कर पूरी मानव सभ्यता को झकझोर कर रख दिया है। नदियों एवं जल स्रेतों को पोषित करने वाले क्षेत्रों में वानस्पतिक आवरण नष्ट होने के कारण वर्षा का जल भूस्खलन को बढ़ावा दे रहा है। इसलिए भू क्षरण, भूस्खलन एवं परंपरागत जल-स्रेतों के सूखने का सिलसिला तेज होता जा रहा है। नंगी तथा वीरान धरती पर वानस्पतिक आवरण तैयार करने की ठोस कार्ययोजना बनाए जाने की आज सबसे बड़ी जरूरत है। भूस्खलन वाले क्षेत्रों पर विशेष नजर रखकर ऐसे क्षेत्रों को पहले ही नियंत्रित करने के लिए व्यावसायिक गतिविधियां प्रतिबंधित की जानी चाहिए। इसे रोकने के लिए परंपरागत तथा वैज्ञानिक दोनों प्रकार के तरीकों को अमल में लाया जाना चाहिए। मोटरमागरे के अंधाधुंध निर्माण से भी भूस्खलन के खतरे बढ़े हैं। इनका निर्माण भूस्खलन एवं भू कटाव के एक बड़े कारक के रूप में उभरा है। इसलिए मोटरमागरे का निर्माण आधा कटान और आधा भरान पद्वति के आधार पर करने के साथ ही मलबे के निस्तारण के लिए डंपिंग जोन स्थापित किये जाने चाहिए। चमोली-रांगतोली मार्ग के इस पद्धति के बन जाने से आज यह सड़क भूस्खलन के खतरे से दूर है। पर्वतीय क्षेत्रों के लिए योजना आयोग द्वारा सड़क निर्माण के लिए सातवीं पंचवर्षीय योजना में दी गई गाइडलाइन का सख्ती से अनुपालन होना चाहिए। वैसे भी उत्तराखंड के हिमनदों, हिमतालाबों, लैंड स्लाइड और संवेदनशील क्षेत्रों के व्यापक अध्ययन की पूरी जानकारी हमारे पास होनी चाहिए। उसी आधार पर सतर्कता भी बरती जानी चाहिए। इसके लिए एक राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय नेटवर्क तैयार कर लोगों को इस तरह के खतरों से आगाह करने के लिए व्यापक तंत्र खड़ा किया जाना चाहिए। आपदाओं से संबंधित सूचनाएं व प्री-अलार्म सिस्टम को डेवलप कर आपदा न्यूनीकरण में मदद मिल सकती है।

वर्षा की मारक क्षमता को किस तरह कम किया जा सकता है?

अस्थिर क्षेत्रों में निर्माण कार्य एवं उसके अवशिष्ट को बेतरतीब ढंग से जल धाराओं की ओर गिराने से ही नदियां बौखला रही हैं। इसलिए बारिश की बूंदों का रोकने का समुचित प्रबंध होना चाहिए। ये बूंदें समृद्वि के रूप में सामने आती हैं किंतु बारिश से उत्पन्न खतरों के प्रति उदासीनता बरतने के कारण ही वह विनाशक रूप में सामने आ रही हैं। वर्षा की मारक क्षमता कम करने के लिए संवेदनशील क्षेत्रों में छेड़खानी को कम किया जाना चाहिए। छोटे- बड़े नगरों तथा कस्बों में पानी की समुचित निकासी की व्यवस्था कर इस तरह की आपदा से काफी हद तक निजात मिल सकती है।

सामाजिक जागरूकता के माध्यम से क्या इस क्षेत्र में हरियाली कार्यक्रमों से प्राकृतिक तबाही रुकी है?

क्यों नहीं? चमोली जिले के मंडल नामक स्थान में 24 अप्रैल 1973 को हम सब लोगों ने वहां के सामाजिक कार्यकर्ता आलम सिंह बिष्ट की अध्यक्षता में एक बैठक कर जंगलों को बचाने के लिए चिपको आंदोलन की शुरुआत भावी खतरों को देखते हुए ही की थी। इसी का परिणाम है कि मंडल-चोपता-ऊखीमठ सड़क मार्ग 10,000 हजार फीट ऊंचे हिमालयी क्षेत्र से गुजरने के बाद भारी बरसात में भी कभी बंद नहीं होती। यह चिपको आंदोलन की एक बड़ी सफलता को दर्शाता है। इसी तरह, 1975 में जोशीमठ के अस्तित्व को बचाने के लिए डिग्री कॉलेज, गोपेश्वर के छात्रों तथा वन विभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों ने वहां डेरा जमाकर वातावरण का निर्माण किया। आज भी जोशीमठ के अस्तित्व पर प्रकृति ने मुसीबत खड़ी नहीं की है। इसके लिए ही आज भी हमारी चिपको आंदोलन की मातृ संस्था दशोली ग्राम स्वराज्य मंडल ग्रामीण क्षेत्रों में पर्यावरण एवं वन संवर्धन शिविरों का आयोजन कर लोगों को हरियाली के प्रति जागरूक करने में जुटी हुई है।

क्या हिमालय की नदियों पर बन रही जलविद्युत परियोजनाएं भी विनाश की प्रमुख वजह हैं ?

जल विद्युत परियोजनाएं निस्संदेह बाढ़ से भारी तबाही मचा रही हैं। परियोजनाओं द्वारा छोड़े गए मलबे के ढेरों के समुचित निस्तारण के लिए सख्ती से कदम उठाये जाने चाहिए। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी भी स्थिति में वह नदियों में न भरे। गांवों के नीचे से ऐसी परियोजनाओं के लिए सुरंगें कदापि नहीं खोदी जानी चाहिए। यही नहीं, इन बांधों को बनने से होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए जिम्मेदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। भविष्य में बड़ी परियोजनाओं का निर्माण संवेदनशील क्षेत्रों में तत्काल बंद किया जाना चाहिए। हिमालय पर्वत जो देश की प्रमुख नदियों का उद्गम क्षेत्र है, वह आज भी विकासमान स्थिति में है। इसमें केंद्रीय भ्रंश समेत कई बड़े-छोटे और भ्रंश भी हैं। वैसे भी संवेदनशीलता के हिसाब से जोन-5 तथा जोन-4 के अंतर्गत होने से आने वाले भूकंप भी इसकी अस्थिरता को बढ़ाते रहते हैं। ऊपर से मानवीय गड़बड़ियों को नहीं रोका गया तो हमारा अस्तित्व ही सिमट कर रह जाएगा।

उत्तराखंड में जल पल्रय के पश्चात महाविनाश से निपटने के लिए पुर्ननिर्माण की प्रक्रिया कैसे शुरू की जानी चाहिए?

अब पूरे देश के नियोजन का केंद्र बिंदु हिमालय का संरक्षण होना चाहिए। प्रकृति के संरक्षण पर बल देकर टिकाऊ विकास की अवधारणा को साकार कर ही इस तबाही के बाद पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाना चाहिए। मौजूदा मानकों से हटकर निर्माण कायरे के टिकाऊ बने रहने के लिए आर्थिक एवं तकनीकी ज्ञान उदारतापूर्वक दिया जाना चाहिए। इस तबाही के बाद बचाव तथा राहत कार्यक्रम निपटने के पश्चात अब पुनर्निर्माण एक बड़ी चुनौती है। इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए हिमालय के संरक्षण की दिशा में ठोस कार्यक्रम लागू कि ये जाने चाहिए। 1991 तथा 1999 में उत्तरकाशी तथा चमोली में भूकंपों के कारण यह क्षेत्र बेहद संवेदनशील बन गया है और भूस्खलन की प्रक्रिया तेजी से वर्षो पुरानी बसागत का ही अस्तित्व समाप्त करती जा रही है। इसके लिए बिगड़े हुए पणढालों को हरियाली से आच्छादित करने का लोक कार्यक्रम खड़ा किया जाना चाहिए। अब तक आर्थिक विकास की नीतियां यहां की संवेदनशीलता तथा विविधता पूर्ण भौगोलिक स्थितियों को ध्यान में रखकर नहीं बनाई गई हैं। विकास की गतिविधियों का प्रमुख लक्ष्य मृदा व धरती की कमजोर संरचना को सुरक्षा प्रदान करना होना चाहिए। पुर्ननिर्माण में अब पीड़ित क्षेत्र के लोगों का पुरुषार्थ जगाना हमारी पहली कोशिश होनी चाहिए।सहायता वस्तु के रूप में दी जानी चाहिए। सरकार, संस्थाओं तथा व्यक्तिगत दान दाताओं के साथ ही क्षति की पूर्ति में पीड़ित व्यक्ति का अंश भी किसी न किसी रूप में शामिल होना चाहिए।

अब भविष्य की चुनौतियों से कैसे निपटा जा सकता है ?

ग्राम स्तर पर समितियों का गठन किया जाना चाहिए। इसमें ग्राम संगठनों के अलावा गांव अथवा पंचायत स्तर पर कार्यरत कर्मचारियों की जिम्मेदारी भी सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि आपदा आने पर वे स्वयं सक्रिय हो सकें। बचाव के लिए संपर्क साधनों की उपलब्धता भी सुनिश्चित होनी चाहिए। स्थानीय स्तर पर आपदा का सामना करने के लिए ग्रामीणों के प्रशिक्षु दल गठित होने चाहिए ताकि आपदाकाल में वे बचाव तथा राहत कार्यक्रमों से पहले से निपट सकें। यही नहीं, उन्हें क्षति के आकलन और राहत सामग्री के वितरण के अधिकार भी दिए जाने चाहिए।

मौजूदा तबाही से निपटने में क्या सरकार विफल नहीं रही?

इस तरह की आपदा से निपटने की नैतिक जिम्मेदारी सरकार की तो है ही किंतु हमें भी अपने भीतर का पुरुषार्थ जगाना होगा। लगातार आपदाओं से घिरे रहने के बावजूद प्रकृति की चुनौतियों से निपटने के लिए कोई ठोस तंत्र ही खड़ा नहीं हो पाया है। हम अपने रहन-सहन को प्रकृति के अनुरूप नहीं ढाल पाये हैं। इस आपदा के बाद तो अब और चेतने की जरूरत है। हमारे सामने विकास की नई चुनौतियां हैं और हमें उजड़े हुए लोगों की गृहस्थी बसाने की ओर पहला ध्यान केंद्रित करना होगा। हालांकि इन सबकी नैतिक जिम्मेदारी सरकार की है लेकिन सरकार के भरोसे रहने के बजाय हमें अपने खोए आत्मविश्वास को लौटाने की जरूरत भी है। आपदा को रोका तो नहीं जा सकता लेकिन इसके प्रभाव को कम तो किया ही जा सकता है। इसलिए हिमालय की सेहत को सुधारकर ही आपदाओं से बचाव संभव है। सरकार को भी गलतियों से सबक लेकर पुनर्वास के कार्यक्रमों को बेहद संजीदा ढंग से संचालित करना होगा।

-राष्ट्रीय सहारा, जुलाई 20, 2013 (Rashtriya Sahara, July 30, 2013)

Is it wise to have hydropower project near Badrinath. — An old report by Chandi Prasad Bhatt on a power project near Badrinath. Translated from Hindi

Uttrakhand Himalaya is endowed with rich bio-diversity and provides wide varieties of natural resources including the life sustaining water to the Indian sub-continent. In the recent times, the enormous hydroelectricity potential of Uttarakhand has made it

synonymous with the URJA-ANCHAL (Power State). Driving through various river
basins, one can witness that majority of the river valleys are riddled with hydropower
construction activities.
One such project is planned near Badrinath between Rarang Chatti and Kiro Gad
(Hanuman Chatti). According to the project report, the proposed barrage site would be ~3
km down stream of the Badrinath temple. Total catchment area of the river basin at the
barrage site would be 1010 km2 out of which around 660 km2 is snowy catchment. Water
from the barrage will be diverted through a 2875 m long and 4.3 m diameter head race
tunnel that will open near Kiro Gad where an underground power house is proposed.
Total cost of the project as on 2006 was 1456.65 crore rupees. Here it is worth
mentioning that the proposed barrage site of this project ~15 km upstream from the
Vishnuprayag project. Becasuse of the Vishnuprayag project the Alaknanda River
between Lambaggar and Govind Ghat has become a dry Nala (Fig.1).

Figure-1 Picture showing the river above the Vishnuprayag barrage (a) and below the barrage (b)

Figure-1 Picture showing the river above the Vishnuprayag barrage (a) and below
the barrage (b)

There is no denial that the terrain lays in ecological fragile zone, particularly,
Khiro valley is known for its rare habitat of musk deer, Himalayan black bear, Himalayan
peacock (monal) and many rare floras. Considering the ecological sensitivity of the
terrain, concern has already been raised regarding the impact on flora and wildlife of
area.

Hatched area indicate glacial deposits.

Figure-2 Hatched area indicate glacial deposits.

We have been traveling through this region which is dominated by the avalanche
debris and glacial deposits (Fig. 2). There is evidence to suggest that Alaknanda River
was dammed by the glacier deposits in the past. In fact there are spectacular lake deposits
right near the proposed barrage site at Rarang Chatti. In addition to this, Rishi Ganga that
originates from Nilkant is known to contribute exceptionally large amount of glacial
sediment that at times block the river.
According to a study published in current science showed that glacier descended
well below the Rarang Chatti (3000 m). These are loose deposits which readily eroded by
the Alaknanda River as a result entire stretch of the river bed between Hanuman Chatti
and Badrinath is covered with glacial boulders (Fig. 3).

Alaknanda River is covered with boulders that eroded from the flanking glacial deposits.

Figure-3 Alaknanda River is covered with boulders that eroded from the flanking
glacial deposits.

Besides this, there are innumerable cirque glaciers on either side of the Alaknanda
River between Hanuman Chatti and Badrinath which contribute both snow and debris
into the river during the winter. Historical evidence suggests that the Alaknanda River
was temporarily blocked in the upstream by avalanches and moraines and the breaching
of blockades caused unprecedented damage around Badrinath. Most recent incident
occurred few years ago that wiped out a suspension bridge near Mana village along with
the deposition of thick pile of sediments.
Water is the main ingredient of the power project. Our experience with
Vishnuprayag project was that we failed to apprehend that there would significant
decrease in the water discharge during the winter as a result it would not be possible to
generate proposed power during winter months. In case of Badrinath project which more
close to the glacier, can we maintain 300 MW power generations during the lean seasons
(winter)?
It is mandatory to have Environmental Impact Asses done before the project is
approved. We are sure the EIA exercise must have been done for the Badrinath project as
well. What safeguards the EIA report suggested for the points raised above? Although
EIA is prepared by a team of dedicated scientists, but no body evaluates the scientific
capabilities of the scientist involved or engaged in EIA report preparation. They may
be good in their respective discipline but when comes to evaluating the impact of a power
project it requires an integrated approach with utmost sensitivity.
We have already paid the price of commercial forest exploitation in the region.
Thanks to the people whose efforts are now bringing back the lost natural resources in the
region. Watersheds which were badly inflicted by wounds caused by large-scale
commercial forest denudation are in the process of recovery. In such a situation, this new
venture of harnessing the river waters for generating electricity particularly in the
ecologically sensitive higher Himalayan region of Uttarakhand should not turn out to
become developmental disaster.

Translated from original Hindi

Sustainable development’s only possible with ecological balance: Chandi Prasad Bhatt

Magsaysay awardee Chandi Prasad Bhatt is a noted environmentalist and a pioneer of the tree-saving Chipko Andolan in Uttarakhand. Speaking with Swati Mathur, Bhatt discussed the build-up to the region’s devastating floods, aerial surveys versus ground reality – and how sustainable development and ecological welfare are interlinked:

Why is the flooding occurring in Uttarakhand being dubbed a disaster waiting to happen?

Actually, what’s happened in Uttarakhand is nothing short of a calamity. Traditionally, Uttarakhand has always been prone to floods and landslides. However, what happened now is a result of sheer callousness. The Bhagirathi and Alaknanda have always been sensitive, flood-prone rivers. On countless occasions, we apprised the authorities about damage happening there with steps to curb further problems. There were landslides, felled deodar trees and mountain ranges being indiscriminately dynamited in the name of deve-lopment. Local papers reported this, we also alerted the autho-rities – but nothing was done.

My submission is, there is a way to do things correctly – like, build stone walls on the sides, then pour in earth to widen roads. That will ensure development and protect from further damage.

What other measures can curtail more environment-linked problems?

Well, the mountains really need an immediate plan to tackle further damage – and doing this scientifically is possible. There is an urgent need to develop a detailed warning system that alerts residents and visitors across this Himalayan region. Several government agencies need to work closely for this. For instance, the Geological Survey of India (GSI), Indian Space Research Organisation (ISRO) and the Met department need to work together.

The GSI must identify vulnerable mountain areas, ISRO, through satellite mapping, must identify cracks and monitor them, and the Met department must give advance warning of inclement weather. Once this warning system is made effective, collateral damage of the kind unleashed in Uttara-khand can be prevented.

The blueprints exist – unfortunately, they are just not being implemented.

Are there sound practices citizens can adopt?

Yes. We certainly advocate tree plantation. Garhwal actually has a very strong tradition of practices carried forward through generations which play a major role in mitigating effects of climate change. For instance, drainage systems were deve-loped around villages to ensure that rivers in spate don’t flow in.

But many new urban pockets that have come up here have not followed these advisories – this time, when the floods came, these areas were swamped.

Have you shared such advice with the authorities?

Yes, but our advice has fallen on deaf ears. There is a need to understand that sustainable development is only possible by maintaining the ecological balance. Everyone needs to understand that drawing from the hills cannot be a one-way process.

Leaders like H N Bahuguna, Indira Gandhi and Rajiv Gandhi responded to letters when they were apprised of critical situations and a need for change – now, apart from aerial surveys, little is done on the ground.

We are grateful for such surveys though and i have written to Sonia Gandhi too, thanking her for her concern. But the Himalayas need more than just aerial surveys. There is a lot of groundwork that needs to be done. At present, instead of spreading awareness about the ills of ecological imbalances, the Garhwal Vikas Mandal Nigam has itself built guesthouses and cottages on riverbanks. This may sound like a doomsday prediction but if we don’t stop now, the extent of calamities will only multiply.

Published by Times Of India on 25 June 2013

टिकाऊ विकास, पर्यावरण संतुलन के साथ ही संभव

मैगसेसे अवॉर्ड विजेता और सुपरिचित पर्यावरणविद चंडी प्रसाद भट्ट चिपको आंदोलन के अगुआ माने जाते हैं। इनकी मान्यता है कि पर्यावरण संतुलन के साथ ही टिकाऊ विकास हो सकता है। स्वाति माथुर के साथ हुई एक बातचीत में चंडी प्रसाद ने उत्तराखंड में आई आपदा के कारणों का खुलासा किया है। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के कुछ चुनिंदा अंश:

पिछले दिनों उत्तराखंड में आई बाढ़ को एक संभावित आपदा क्यों बताया जा रहा है?

वास्तव में, उत्तराखंड में जो घटना हुई है वह सिर्फ एक आपदा नहीं है। सच बात तो यह है कि परंपरागत रूप से उत्तराखंड ऐसा क्षेत्र है जहां बाढ़ आने की संभावनाएं बनी रहती हैं और यहां भू-स्खलन प्राय: होता रहता है। लेकिन इस समय जो आपदा आई है और विनाशकारी घटना घटी है उसके पीछे सबसे बड़ा कारण सरासर व्यवस्थागत लापरवाही है। गंभीर बात यह है कि भगीरथी और अलकनंदा ऐसी नदियां हैं जहां समय समय पर बाढ़ आती ही रहती है। हमने कई बार अनेक अधिकारियों और प्राधिकरणों को इस क्षेत्र में होने वाले नुकसान और इससे होने वाली समस्याओं से आगाह किया है।

विकास के नाम पर देवदार के पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और यहां के पहाड़ों को तोड़ने की वजह से भू-स्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं। स्थानीय अखबारों ने भी इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया है और हमने भी प्राधिकरणों को चेताया लेकिन इस पर ध्यान ही नहीं दिया गया। मेरे विचार में सही तरीके से पत्थरों की दीवारें बनाई जाएं और उन्हें चौड़ी सड़क के किनारे खड़ा किया जाए। यही सही तरीका है। अब हमें इस तरह के विकास को अवश्य सुनिश्चित करना होगा। तभी इससे आगे होने वाले नुकसानों को रोका जा सकेगा।

पर्यावरण से जुड़ी और किन-किन समस्याओं को कम किया जा सकता है?

यह बहुत अच्छा सवाल है। भविष्य में कोई नुकसान न हो इसके लिए पहाड़ों की सुरक्षा के लिए जल्द ही कुछ विशेष उपाय किए जाने की जरूरत है और यह वैज्ञानिक ढंग से ही हो सकता है। हिमालय के इस क्षेत्र में रहने वालों और यहां भ्रमण करने वालों को सावधान करने के लिए हमें कोई वॉर्निंग सिस्टम विकसित करना होगा। कुछ सरकारी एजेंसियों को इसके लिए खुद आगे बढ़कर काम करना होगा। उदाहरण के लिए, जिओलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जीएसआई), इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) और मौसम विभाग को आपस में मिलकर काम करना चाहिए।

जीएसआई, असुरक्षित अथवा अतिसंवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों का आसानी से पता लगा सकता है जबकि इसरो, सैटलाइट मैपिंग के माध्यम से इसकी दरारों को चिह्नित कर सकता है और उस पर निगरानी रख सकता है। मौसम विभाग पहले से ही खराब मौसम की चेतावनी दे सकता है। एक बार इस वॉर्निंग सिस्टम को प्रभाव में लाने के बाद, उत्तराखंड में होने वाले ऐसे नुकसानों को निश्चित रूप से रोका जा सकेगा। हालांकि योजनाएं बन चुकी हैं लेकिन दुर्भाग्यवश इन्हें अमल में फिलहाल नहीं लाया जा रहा है।

इस दिशा में क्या ऐसी कोई सक्षम कार्यप्रणाली है जो उत्तराखंड के निवासियों द्वारा अपनाई जा सके?

हां। हम वहां वृक्षारोपण के लिए लोगों को प्रोत्साहित करते हैं। गढ़वाल यहां का ऐसा पारंपरिक इलाका है जहां के लोग जलवायु परिवर्तन की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उदाहरण के लिए, वहां गांव के चारों ओर ड्रेनेज सिस्टम विकसित किया गया ताकि नदी का बहाव गांव की ओर न आए। लेकिन, बाद में आधुनिक विकास के साथ साथ यहां शहरी इलाके भी बसने लगे और इन इलाकों में हमारी बनाई एडवाइजरी को नहीं माना गया। इस बार जब बाढ़ आई तो यह इलाका पूरी तरह जलमग्न हो गया।

क्या आपने इस तरह की सलाह अथॉरिटीज को पहले दी है?

हां, हमने अथॉरिटीज को सलाह दी है कि टिकाऊ विकास सिर्फ पर्यावरण संतुलन के साथ ही संभव है। लेकिन उन्होंने हमारी सलाह को दरकिनार कर दिया। मौजूदा हालात में अब हर किसी को यह समझना होगा कि पहाडि़यों के मनोरम दृश्य से सिर्फ लाभ लेना एकतरफा सोच हो सकती है। हेमवती नंदन बहुगुणा, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी सरीखे नेताओं को जब लेटर लिखकर इस विकट स्थिति के बारे में बताया गया तो उन्होंने उस ओर ध्यान भी दिया था। बाद में तो सिर्फ हवाई सर्वे कर औपचारिकताएं पूरी कर ली जाती रहीं। जमीनी स्तर पर कोई खास ध्यान नहीं दिया जाता था। लेकिन अब इस दिशा में सर्वे के लिए हम सोनिया गांधी के आभारी हैं। मैंने एक पत्र लिखकर उनका आभार भी प्रकट किया है। लेकिन अब भी जमीनी स्तर पर काम करने के लिए बहुत सारे काम बचे हुए हैं जिन्हें पूरा करने की जरूरत है। वर्तमान में पर्यावरण असंतुलन के बुरे नतीजों के बारे में जागरूकता फैलाने के बावजूद गढ़वाल विकास मंडल निगम ने नदियों के तटों पर अपने गेस्ट हाउस और टूरिस्टों के लिए कॉटेज बना लिए हैं। यह प्रलय के दिनों का पूर्वाभास करा रहा है। बावजूद इसके हम इसे रोक नहीं पा रहे हैं। इससे आने वाले समय में आपदाओं में और बढ़ोतरी होगी।

 

-नवभारत टाइम्स, जुलाई 6, 2013 (Nav Bharat Times Jul 6, 2013)

नदी तीर का रोखडा जत कत सौरों पार

पिछले पांच जून से मैं वरिष्ट पत्रकार श्री सुरत सिंह रावत तथा ओेमप्रकाश भट्ट के साथ उत्तरकाशी गंगोत्री तथा यमुनोत्री यात्रा पर गया था इस दौरान भैरोंघाटी से गंगोत्री के बीच का दृष्य देखकर हम स्तब्ध रह गए थे, देवदार के जंगलों से आच्छादित इस सुन्दर घाटी को रास्ता चैड़ीकरण के नाम से बूरी तरह से रौदा गया था। कारतूस के धमाकों से पहाड़ को तोड़ा जा रहा था जिसमें हजारों देवदार के पेड़ भी काटे गए तथा बड़ी-बड़ी मशीनों से पहाड़ को उलट-पुलट कर भागीरथी में गिराया जा रहा था। यही हाल भागीरथी की सहायक धारा जाड़ गंगा में भी यह हो रहा था।

भागीरथी घाटी की समस्याओं को समझने के लिए हमने 2007 में भी यात्रा की थी उस समय हमने सुझाव दिया था कि मोटर सड़क को यदि चैड़ा करना आवश्यक है तो खड्ड साईड में पत्थरों की दिवाल बनाकर सड़क चैड़ी की जानी चाहिए।

यह तो उत्तराखण्ड हिमालय में विनाश को बुलावा का एक उदाहरण है, उत्तराखण्ड में सौर-पिथौरोगढ़ से आराकोट बंगाण तक यह विनाश जहां तहां देखा जा सकता है। इसलिए जब सोलह तथा सत्तरह जून को उत्तरकाशी से श्री रावत जी का तथा उखीमठ से जिला पंचायत अध्यक्ष का टेलिफोन आया कि उत्तरकाशी और केदारनाथ में भारी विनाश हो गया है, मुझे आश्चर्य नही हुआ, मैने एकबारगी कहा कि यह तो होना ही था, मैं तब स्तब्ध रह गया जब पता चला कि केदारनाथ, रामबाणा, गौरीकुण्ड, सोनप्रयाग आदि स्थानों में देश के कोने कोने से आये हुए हजारों तीर्थयात्री मारे गए या लापता हुए। मैं तो उन्हें मात्र श्रदान्जली ही दे सकता हूं। लेकिन यह सवाल मुझे बार-बार कचोटता रहा कि क्या इस त्रासदी को हम रोक या कम कर सकते थे?

आज हजारों तीर्थ-यात्रियों के साथ सैकड़ों उत्तराखण्डवाशी भी इस त्रासदी में मारे गए या लापता हो गए हैं तथा तिलबाड़ा से लेकर केदारनाथ तक मंदाकिनी घाटी उजाड़ हो गई है। इससे उभरने में स्थानीय लोगों को भी बहुत समय लगेेगा। यह हाल न केवल मन्दाकिनी घाटी का है अपितु भागीरथी से लेकर काली नदी तक का है। अलकनन्दा की उपत्यका में भी बदरीनाथ से 15 किलोमीटर नीचे बेनाकुली के पास विष्णुप्रयाग परियोजना का बैराज नष्ट होने से बौखलायी अलकनन्दा ने गोविन्दघाट बिरही श्रीनगर आदि के कई भवनों को तहस-नहस कर दिया। इसी प्रकार लक्ष्मणगंगा के तूफान ने भ्यूडार घाटी को भी तहस नहस कर दिया। इन सुन्दर वादियों के साथ हमारा पुराना संबंध रहा है और कई बार इन वादियों के संरक्षण और संबद्र्वन के लिए हमकों आंदोलन भी चलाना पड़ा और जब इन वादियों में गड़बड़ी शुरू हुई तो न केवल इन वादियों के लिए अपितु पूरे उत्तराखण्ड को समझने के लिए हम सक्रिय हुए।

इस संदर्भ में तीन दशक पूर्व ‘‘ अधूरे ज्ञान और काल्पनिक विश्वास से हिमालय से छेड़खानी घातक’’ यह विवरण हमने सन 1982 में जब उत्तराखण्ड के अतिसंवेदनशील क्षेत्र बदरीनाथ से 15 कि.मी. नीचे लामबगड़ में अलकनन्दा को मोड़कर निमार्णाधीन विष्णुप्रयाग परियोजना को लेकर तैयार किया था। इसमें न केवल अलकनन्दा अपितु सम्पूर्ण उत्तराखण्ड के बारे में विवरण तैयार किया था और इस विवरण को तत्कालिन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरागांधी को देने के लिए गढ़वाल के सांसद श्री हेमवन्तीनन्दन बहुगुणा तथा कृषि विज्ञानी डा. एम.एस. स्वामीनाथन जी को दिया था। बहुगुणा जी ने तत्काल ही पत्र का उत्तर दिया जिसमें उन्होंने लिखा कि,

‘‘ आपका पत्र तथा रिपोर्ट पढ़ने को मिली धन्यवाद। आपने बड़े परिश्रम से कार्य किया है, इसके लिए आप बधाई के पात्र हैं। मैं तो स्वयं ही पहाड़ों को तोड़ने, वनों के कटान आदि के खिलाफ हूं। जैसा कि स्वयं आपने लिखा है मैने अपने मुख्यमंत्रितत्वकाल में इस विनाश की ओर ध्यान दिया था मन है भी कुछ करना चाहता हूं अन्यथा यह पहाड़ तोड़-तोड़ कर ढेर बना देंगे। हम कही न होंगे। आपके सुझाव ठीक हैं स्थानीय जनमानस को भी तैयार करना होगा तभी कुछ हल निकलेगा, प्रधानमंत्री का ध्यान आकृष्ट कर रहा हूं।’’

बहुगुणा जी ने तत्कालिन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी को भी लिखा कि

’’उत्तराखण्ड में कतिपय बड़े-बड़े जलाशय एवं विद्युत परियोजनाओं पर सर्वेक्षण प्रस्तावित है। यहां से  उदगमित गंगा की मुख्यधारा अलकनन्दा, भगीरथी,यमुना,टोंस,  रामगंगा, काली, सरयु आदि अनेक सहायक नदियों के प्रवाह क्षेत्र में भू-क्षरण, भू-स्लखन एवं बाढ़ की स्थिति दिनों-दिन बिगड़ती जा रही है। इनके प्रवाह क्षेत्र की अस्थिरता के कारण सम्पूर्ण उत्तराखण्ड ही नहीं सारा देश इसकी चपेट में आ जाता रहा है। इनके द्वारा लायी गई मिट्टी से जलाशयों के समय पूर्व भर जाने का भी अंदेशा है। इस स्थिति में बाढ़ के भयंकर दुष्परिणामों को नकारा नहीं जा सकता है। इस क्षेत्र के वन, वनस्पतियों, जड़ी-बूटियों तथा कुटिर उद्योगों और भू-संरक्षण के आधार बने हुए हैं, जिसने पर्यावरण के संतुलन को कायम रखा हुआ है। सड़कों के जाल तथा विकास परियोजनाओं के नाम पर जिस प्रकार बेतहासा वनों का सफाया हो रहा है जिससे भूस्खलन, कृषि भूमि के कटाव, मकानों की क्षति और जनधन की व्यापक हानि होती रही है। विकास के लिए परियोजनाओं की नितान्त आवश्यकता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है किन्तु सही मायने में वहीं परियोजनाये सफल मानी जायेगी जो विनाश रहित होंगी। जिनके क्रियान्वयन से क्षेत्र की जनता को, प्र्राकृतिक सम्पदा को और क्षेत्र की रमणीयता को कोई क्षति न पहुंचती हो। श्री चण्डी प्रसाद भट्ट ने इस क्षेत्र की प्रस्तावित परियोजनाओं के संदर्भ में व्यापक रूप से चर्चा की है। मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आप इनके द्वारा प्रस्तुत किए गए सुझावों पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देंगी जिससे विकास के मनोहर स्वप्न में खोकर क्षेत्र की सुन्दरता नष्ट न हो। ग्रामीणों के मकान और आजिविका के साधन क्षतिग्रस्त न होने पाये। वन सम्पदा का अंघाघुंध सफाया न हो और परियोजनाओं के सुपरिणाम निकल सके।’’

इसके बाद भारत सरकार ने प्रो. एम.जी.के. मेनन की अध्यक्षता में बांधों, विद्युत परियोजनाओं तथा सिचाई परियोजनाओं के लिए टास्क फोर्स गठित किया था तथा अलकनन्दा के संवेदनशील क्षेत्र में विष्णुप्रयाग परियोजना के निमाण में जो आपत्तियां मैने उठायी थी उसके अनुसार भ्यूडार गंगा को अलकनन्दा में समाहित करने की योजना को विद्युत आथरिटी ने निरस्त कर दिया तथा दो दशक तक न केवल विष्णुप्रयाग अपितु श्रीनगर परियोजना स्थगित रही। जिसे बाद में पिछली शताब्दी के अंत में प्राईवेट कम्पनियों के हाथ में उत्तरप्रदेश सरकार ने सौप दिया था लेकिन आज इस परियोजना के लिए बना बैराज तो नष्ट हुआ ही उसके मलबे से अलकनन्दा बौखलायी जिससे लामबगड़, पाण्डुकेश्वर,गोविन्दघाट में दर्जनों मकान व वाहन नष्ट हुए। अलकनन्दा की बौखलाहट में आगे विरही में गढ़वाल मंडल का विश्राम गृह तथा श्रीनगर का निचला भाग भी दलदल से पट गया। आज राजनेता प्रशासक एवं टैक्नोक्रेट अपनी जिम्मेदारी से हाथ झाड़ते हुए प्रकृति को कोस रहे हैं कि अधिक बारिस से यह सब हुआ।

मुझे याद है कि सन 1956 के अक्टूबर महीने में पांच दिन तक तेज बारिस हुई, जगह-जगह भूस्खलन तो हुआ लेकिन जनधन की हानि नाममात्र की हुई। मुझे बचपन की याद है कि हमारे गांव में भारी बारिस के बाद न जलभराव और नहीं भूस्खलन की भयंकरता दिखी और तब गोपेश्वर की आबादी मुस्किल से पांच सौ के लगभग होगी। आज गोपेश्वर का विस्तार हो गया है और यहां की आबादी 15 हजार से अधिक होगई है।

आज के फैले हुए गोपेश्वर में बरसात के दिनों में टूट-फूट  एवं जलभराव की घटना यदा-कदा होती रहती है लेकिन जो पुराना गांव है उसमें अभी तक इस प्रकार की गड़बड़ी नही के बराबर है। आज से सैकड़ों साल पहले गोपेश्वर मन्दिर के दक्षिण दिशा की ओर  पूर्व में भूमिगत नाली पानी की निकासी के लिए बनी थी जिसमें जलभराव की नौबत ही नहीं आती।

पहले हिमालयी क्षेत्रों में गांव की रचना के साथ साथ मकानों के निमार्ण स्थल पर भी बहुत सावधानी बरती जाती थी। स्थल की मिट्टी को आधार मानकर निमार्ण की सहमति होती थी। उससे निमार्ण आरम्भ करने में सात सावन की कहावत प्रचलित थी। वुनियाद रखते समय श्रावण के महीने की सात दिन की बारिस के बाद जब जमीन बैठ जाती तो उससे फिर आगे कार्य किया जाता। उसमें दीवाल बनाते समय पत्थरों के जोड़-तोड़, गुडि़या, हुत्तर आदि का पूरा ध्यान रखा जाता था। मकानों के निमार्ण में भूमिधसांव एवं भूकम्प को सहने का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाता था। मकान के तीनों ओर से गैड़ा { पानी के प्रवाह की नाली} निकाला जाता था और उसकी सफाई का पूरा ध्यान रखा जाता था गांवों में बर्षात से पूर्व डांडा गूल की सफाई की जाती थी जिससे बारिस का पानी गांव के बीच न बहे और गांव का नुकसान न हो। जहां गांव ढाल पर बसे है वहां उपरी भाग में इस तरह की डांडा गूले बनायी जाती थी। बर्षा का पानी दोनों छोर से विना अवरोध के प्रवाहित हो जाय यह ध्यान न केवल गांव की बसासत में अपितु जितने भी पुराने तीर्थधाम है उनमें पानी के निकास के अलावा भूमि भार वहन क्षमता और स्थिरता नदी से दूरी आदि का पूरा ध्यान रखा जाता था। बदरीनाथ मन्दिर इसका उदाहरण है जिसमें बदरीनाथ के दोनों ओर एवलांच आदि से मकानों का नुकसान होता रहा किन्तु मन्दिर एवलांच एवं भूकम्प आने के बाद भी सुरक्षित है। कहा जाता है कि बदरीनाथ मन्दिर नारायण पर्वत के‘‘ आंख की भौं’’ वाले भाग के निचले भाग में स्थापित किया गया है’’ जिस कारण मन्दिर हिमस्खनों से सुरक्षित रहता आया है। यही ध्यान केदारनाथ मन्दिर के स्थापत्य में भी रखा गया है। 1991 के भूकम्प से केदारनाथ नगर में क्षति हुई लेकिन मन्दिर सुरक्षित रहा।

नदियों के किनारे बसासत नहीं होती थी। नदी से हमेसा दूरी का रिस्ता रखा जाता था। एक कहावत भी प्रचलित थी ‘‘ नदी तीर का रोखड़ा-जत कत सौरों पार ’’ नदी के किनारे की बसासत जब कभी भी नष्ट हो जाती हैै। इसलिए नदियों के किनारे की बसासत एवं खेती नितान्त अस्थाई रहती। वर्षात के मौसम में वहां रहना वर्जित जैसा था। यही कारण था कि गंगा की मुख्य धारा अलकनन्दा एवं उसकी सहायक धाराओं मे  सन 1970 से पूर्व कई बार प्रलयंकारी भूस्खलन हुए इनसे नदियों में अस्थायई झीले बनी जिनके टूटने से प्रलयंकारी बाढ़ आई पर उपरी क्षेत्रों में इन बाढ़ों से जन-धन की हानि ना के बराबर हुई। सन 1868 में अलकनन्दा की सहायक धारा-बिरही से आयी बाढ़ से लालसांगा {चमोली} में 73 यात्रियों के मारे जाने की जानकारी है। लेकिन इसके अलावा स्थानीय बस्तियों में मानव मृत्यु की जानकारी नहीं है। यही नहीं सन् 1894 की अलकनन्दा की प्रलयंकारी बाढ़ में भी केवल एक साधु की मौत की जानकारी है। भले ही खेत और सम्पति का भारी नुकसान हुआ हो, उसमें भी अलकनन्दा के उद्गम से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर श्रीनगर गढ़वाल में ही ज्यादा नुकसान होना बताया गया। एक समय में श्रीनगर राजाओं की राजधानी के साथ ही गढ़वाल का केन्द्रीय स्थल था इसलिए जनसंख्या के दबाव से नदी के विस्तार के अन्दर आबादी फैलती गई। अलकनन्दा के स्वभाव की अनदेखी की गईं।

सन 1950 के बाद उत्तराखण्ड में स्थित तीर्थ स्थानों, पर्यटक केन्द्रों एवं सीमा सुरक्षा की दृष्टि से मोटर सड़कों का जाल बिछा। अधिकांश सड़कें यहां की प्रमुख नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों से ले जाई गइ। इसी आधार पर पुरानी चट्टियों का आस्तित्व समाप्त हो गया और नए-नए बाजार रातों-रात खड़े हो गए। इनमें कई नये बाजार नदियों से सटकर खड़े हो गये। मोटर सड़क भी कई अस्थिर क्षेत्रों में खोदी गई, कारतूसों के धमाकों से ये और अस्थिर हो गये। सड़कों के आसपास के जंगलों का भी वेतहासा विनाश शुरू हुआ। उपर से नदियों द्वारा टो-कटिंग होता रहा।, इस सबका एकीकृत प्रभाव मोटर सड़क के आसपास की बसावट पर पड़ा।

इस प्रकार की घटना अलकनन्दा के अत्यन्त सम्वेदनशील क्षेत्र गरूड़गंगा से श्रृषिगंगा के संगम तक। 20 जुलाई 1970 को कुंवारी और चित्रकांठा ढांडा जो कि अलकनन्दा की सहायक धारा गरूड़गंगा,पातालगंगा, कर्मनाशा, ढाकनाला और रिंगी गाड़ का जलागम है तथा पूर्व के पणढाल में बिरही नदी का पणढाल हैं में 24 घंटे में 20 सेन्टीमीटर बारिष का होना बताया गया, जिसके कारण ये सभी नाले बौखलयें जिससे अस्थायी बांध बने और टूटे और इसकी जद में बेलाकूची, बिरही, छिनका आदि बाजार और बस्ती पूरी तरह से नष्ट हुई। सड़क पुल खेत आदि तो नष्ट हुए ही तीन सौ किलोमीटर दूर गंगा नहर भी हरिद्वार से पथरी तक सिल्ट से भर गई थी। श्रीनगर गढ़वाल में आई0टी0आई0 के भवन 6 फुट तक साद से पट गए थे तथा दर्जनों यात्री भी मारे गये थे। इसके बाद भी अलकनन्दा की अलग-अलग घाटियों में अगले वर्षों में भी भूस्खलन एवं बाढ़ से लगातार नुकसान होता रहा।

यह न केवल अलकनन्दा बल्कि काली नदी की सहायक धारा धौली-गौरी के पणढालों, तवाघाट-खेला- पलपला में भी वर्ष 1977 से भारी विनाश हुआ जिसमें जन-धन का अपार नुकसान हुआ। बहुत बड़ा इलाका अस्थिर घोषित किया गया। आगे यह क्रम लगातार जारी है। इसी प्रकार भागीरथी घाटी में भी 1978 की गरारी धार के भूस्खलन से बनी झीलों एवं उनके टूटने से टिहरी तक भारी तबाही हुई थी। आगे भी यह क्रम न केवल भागीरथी घाटी में अपितु उत्राखण्ड के अलग-अलग भागों में जारी रहा। सन 1991 एवं 1999 के भूकम्पों से इस भाग में कई भूस्खलन सक्रिय हुए तथा कई क्षेत्रों में दरारें विकसित हुई कई भूभाग सदा के लिए अस्थिर हुए जिसके कारण बरूणावत की जैसी त्रासदी हमारे सामने है जो थमने का नाम नहीं ले रहे। पिछले तीन दशकों में उत्तराखण्ड के गांव गांव को मोटर मार्ग से जोड़ने की महत्वाकाक्षा हमारी रही। एक दर्जन के लगभग राष्ट्रीय एवं राज्य मार्गो  का निमार्ण एवं विस्तारीकरण के अलावा गांवों को जोड़ने के लिए एक हजार से अधिक छोटी-बड़ी मोटर सड़कों का निमार्ण किया गया। मोटर मार्गों के लिए पहाड़ों को काट कर एवं खोद कर मिट्टी एवं चट्टानों को निचले भाग में बेतरतीब ढंग से फेंका जाता रहा। जो निचले क्षेत्र के आबादी एवं कृषि भूमि को बारिष आने पर दल-दल से पाट रही है।

इसी प्रकार जिन-जिन गांवों के नीचे से सुरंगों का निमार्ण हो रहा है साथ ही कारतूस के धमाकों के कम्पन से गांवों की अस्थिरिता भी बढ़ती जा रही है। चमोली जिले का चाई गांव इसका जीता-जागता उदाहरण है। विष्णुप्रयाग जल विद्युत परियोजना के विद्युत गृह के उपरी भाग में स्थित चाई गांव की उजड़ी हुई बस्ती इसकी गवाह है।

इसी प्रकार मनेरी विद्युत परियोजना के लिए बनी सुरंग के उपर स्थित जामक गांव जहां पर 1991 के भूकम्प में सबसे अधिक लोग मारे गए थे। इसी तरह कफकोट क्षेत्र में बढ़ता भूस्खलन और तबाही इस बात के प्रत्यछ उदाहरण है। तपोवन के आसपास के गांव भी विद्युत परियोजना के कारण संकटग्रस्त है।

पहाड़ों में हो रहे भूस्खलन और बाढ़ का का प्रभाव अब सीधे सीधे मैदानों में पड़ता साफ दिखाई दे रहा है। यमुना, भागीरथी, अलकनन्दा, रामगंगा, कोशी के मैदानी क्षेत्र भी अब डूब एवं जलभराव की परधि में आ गए हैं। नदियों का तल उठने से उत्तराखण्ड के तराई क्षेत्र उत्तरप्रदेश, पंजाब, हरियाणा दिल्ली की नदी तीर की बस्तियां अब अधिक तेजी के साथ जलभराव एवं बाढ़ की चपेट में रहे हैं। इससे पहाड़ों समेत मैदानों में भी लाखो लोग तबाही का शिकार हो रहे हैं और विकाश परियोजनायें भी नष्ट हो रही हैं।इस त्रासदी को केवल प्रकृति पर ही नहीं अपितु अनियोजित विकास तथा हमारे द्वारा थोपी गई गड़बड़ी भी जिम्मेदार है।

बारिष का क्रम कभी ज्यादा कभी कम होता रहेगा। आवश्यकता है आज बारिष की मारक क्षमता को कम करना। इसकी मारक क्षमता कैसे कम से कम हो जिससे इस प्रकार की त्रासदी कम से कम हो इस बात पर चिन्तन व कार्यक्रम बनाने की आज सख्त जरूरत है।

इसके लिए पहली बात तो योजनाकारों एवं प्रशासकों व राजनेताओं को यह समझ बनानी होगी कि देश के नियोजन का केन्द्र बिन्दू हिमालय का संरक्षण होना चाहिए। इसके लिए मानकों से हटकर निमार्ण कर्यों के टिकाऊ बने रहने के लिए आर्थिक एवं तकनीकी ज्ञान उदारता पूर्वक दिया जाना चाहिए। इसके लिए जिम्मदारी भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

नदियों,नालों एवं गदेरों में बहने वाली साद की मात्रा इस बात की ओर संकेत कर रही है कि इसे अतिप्राथिमिकता के आधार पर नहीं रोका गया तो इसके भयंकर दुष्परिणाम आगे भी आते रहेंगे। इसके लिए बिगड़े हुए पणढ़ालों में छोटी एवं बड़ी वनस्पति से आच्छादित करने का लोक कार्यक्रम खड़ा किया जाना चाहिए। इन पणढालों में लगने वाली आग को सख्ती के साथ रोकने के लिए ग्राम समुदाय को जिम्मेदारी दी जानी चाहिए। हरियाली का सीधा प्रभाव पणढालों के सम्बद्र्वन पर कैसा पड़ता है यह गोपेश्वर-चोप्ता मोटर मार्ग के बीच मण्डल के जंगल वाले क्षेत्र में देखा जा सकता है जहां अतिवृष्टि के बाद भी भूस्खलन एवं टूट-फूट ना के बराबर होती है। इस बार भी इतनी बारिष के बाद भी यह मार्ग चालू रहा। इस जंगल के लिए सन 1973 में चिपकों आंदोलन आरम्भ हुआ था।

अस्थिर, दरारों एवं भूस्खलन से प्रभावित इलाकों को चिन्हित किया जाना चाहिए।  ऐसे इलाकों की पहचान कर छेड़-छाड़ नहो,इन्हें विश्राम दिया जाना चाहिए। इन पर निगरानी रखी जानी चाहिए। अतिवृष्टि के समय इनमें होने वाली गतिविधियों के लिए चेतावनी तंत्र विकसित किया जाना चाहिए।

मोटर मार्गों के निमार्ण में आधा कटान, नीचले क्षेत्रों में पत्थर की दीवाल बनाकर भरान हो। जिससे नीचे के क्षेत्रों में मलबा न बहे। इसके लिए योजना आयोग द्वारा पर्वतीय क्षेत्रों के लिए सड़क निमार्ण हेतु सातवीं पंचवर्षीय योजना में दी गई गाईडलाईन का सख्ती से अनुपालन किया जाना सुनिश्चित हो। इसका एक उदाहरण चमोली-रांगतोली मोटर मार्ग के निमार्ण में देखा जा सकता है। जिसका वहां की स्थानीय बस्ती चमोली के लोगों की जागरूकता से अनुपालन सम्भव हो सका।

सड़क निमार्ण के दौरान ही स्कपरों का पानी खडि़चानुमा नालियों के द्वारा निकास किया जाना चाहिए। मोटर सड़क से जुड़े गाड़-गदेरो एवं नालों का सुधार भी आवश्यक है। जिनकी बौखलाहट से सड़के और आबादी ध्वस्त हो जाती है।

छोटे-बड़े बाजारों नगरों के पानी की समुचित निकास की व्यवस्था की जानी चाहिए। जलविद्युत परियोजनाओं द्वारा छोड़े गए मलबे के ढेरों के समुचित निस्तारण हेतु सख्ती से कदम उठाये जाने चाहिए। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी भी स्थिति में वह नदियों में न बहे। गांवों के नीचे से परियोजनाओं के लिए सुरंग न खोदी जाय।

निर्मित बांधों के द्वारा होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए जिम्मेदारियां सुनिश्चित की जानी चाहिए।

आगे बड़ी परियोजनाओं का निमार्ण तत्काल बन्द किया जाना चाहिए।

हिमालय पर्वत जो देश की प्रमुख नदियों का उद्गम क्षेत्र है, कहा जाता है कि वह आज भी विकासमान स्थिति में हैं। इसमें मुख्य केन्द्रीय-भ्रंश सहित कई बड़े छोटे और भ्रंश भी हैं तथा जोन 5, जोन 4 के अन्तगर्त होने से आने वाले भूकम्प भी इसकी अस्थिरिता को बढ़ाते रहते हैं। उपर से मानवीय गड़बडि़यो को नहीं रोका गया तो नदियां बौखलायेगी तो वह इस त्रासदी से भी भयंकरतम त्रासदी होगी फिर हम इसे व्यवस्थाजनित कारस्तानी स्वीकार करने के बजाय गंगा और उसकी सहायक धाराओं को कोसेंगे। आज आवश्यकता है प्रकृति के संरक्षण एवं लोगों के कल्याण के बीच समन्वय स्थापित करने की, जिससे टिकाऊं विकास का मार्ग प्रसस्त हो।

– (दैनिक जागरण ३० जून २०१ ३  को प्रकाशित)Dainik Jagran, 30 June 2012 New Delhi